कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । इत्यप्सु लोगं प्रविध्यति ॥१४॥ इदमहमित्यपोह्य ॥१५॥ यो भद्र इत्यन्वीपमुदच्य ॥१६॥ आस्यै ब्राह्मणा इति प्रयच्छति ॥१७॥ आव्रजतामग्रतो ब्रह्मा जघनतोऽधि- ज्यधन्वा ॥१८॥ बाह्यतः प्लक्षोदुम्बरस्योत्तरतोऽग्नेः शाखा- यामासजति ॥१९॥ तेनोदकार्थान्कुर्वन्ति ॥२०॥ तत- श्चान्वासेचनमन्येन ॥२१॥ अन्तरुपातीत्यार्यमणमिति जुहोति ॥२२॥ प्र त्वा मुञ्चामीति वेष्टं विवृतति ॥२३॥ उशतीरित्येतया त्रिराघापयति ॥२४॥ सप्तभिरुष्णाः सम्पातवतीः करोति ॥२५॥ यदासन्द्यामिति पूर्वयोरु- त्तरस्यां स्रक्त्यां तिष्ठन्तीमाप्लावयति ॥२६॥ यच्च वर्चो यथा सिन्धुरित्युत्क्रान्तामन्येनावसिञ्चति ॥२७॥१॥७५॥ यद् दुष्कृतमिति वाससाङ्गानि प्रमृज्य कुमारीपा- लाय प्रयच्छति ॥१॥ तुम्बरदण्डेन प्रतिपाद्य निर्व्रजेत् अनिष्ठम०” इत्यादि से जल में एक मट्टी का ढेला फेके ॥१४॥ “इदमहं०” इत्यादि से नदी में बैठकर घट को जलसे भर लेवे ॥१५॥ “यो भद्र०” इत्यादि को पढ़ कर ॥१६॥ “आस्यै ब्राह्मणा०” इत्यादि से उदक हार को जलभरा कलश देवे ॥१७॥ मार्ग में जाते समय कुमारी के आगे ब्रह्मा, धनुर्धर पीछे ॥१८॥ घर में जाने पर वेदि के बाहर पाकर की शाखापर-अग्नि के उत्तर भाग में जलभरे कलश को स्थापन करे ॥१९॥ उसी से जल का काम करे ॥२०॥ यदि कलश में जल थोड़ा हो तो दूसरे जल से सेचन करे ॥२१॥ “अन्तरुपाती०” इत्यादि से वेदि में प्रवेश कर आहुति देवे ॥२२॥ “प्रत्वा मुञ्चामि०” इत्यादि से कुमारी के केशों को लपेट कर बांधे ॥२३॥ “उशतीः०” इत्यादिसे तीन समिधों को अग्नि में डाले ॥२४॥ “उशतीः०” इत्यादि ७ मंत्रों से उष्णजल के ढार से “यदासन्द्यां०” पूर्वोत्तर कोण में खड़ी कुमारी को शिर से स्नान करावे ॥२५॥२६॥ “यच्च वर्चो यथा०” से उस जगह से जाती हुई अन्य स्थान में ठण्डे जल से उसे सिक्त करे ॥२७॥१॥७५॥ यह पचहत्तरवी कण्डिका पूरी हुई ॥ “यद् दुष्कृतं०” इत्यादि से वस्त्र से कुमारी को सब अङ्गों को पोंछे