कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
पृष्ठ 215, कुल 361 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १८३ ॥२॥ तद्वन आसजति ॥ ३॥ या अकृन्तंस्त्वष्टा वास इत्यहतेनाच्छादयति ॥४॥ कृत्रिम इति शतदन्तैषोकेण कङ्कतेन सकृत्प्रलिख्य ॥५॥ कृतयाममित्यवसृजति ॥६॥ आशासाना सं त्वा नह्यामीत्युभयतः पाशेन योक्त्रेण सन्नह्यति ॥७॥ इयं वीरुदिति मधुघमणिं लाक्षारक्तेन सूत्रेण विग्रथ्यानामिकायां बध्नाति ॥८॥ अन्ततो ह मणिर्भवति बाह्यो ग्रन्थिः ॥९॥ भगस्तेवत इति हस्तेगृह्य निर्णयति ॥१०॥ शाखायां युगमाधाय दक्षिणतो ऽन्यो धारयति ॥११॥ दक्षिणस्यां युगधुर्य्युत्तरस्मिन्द्युगतर्द्मनि दर्भेण विग्रध्य शं त इति ललाटे हिरण्यं संस्तभ्य जपति ॥१२॥ तर्द्मं समयावसिञ्चति ॥१३॥ उपगृह्योत्तरतो ऽग्ने- रङ्गादङ्गादिति निनयति ॥१४॥ स्योनमिति शकृत्पिण्डे
ओर तुम्बर दण्डके साथ वस्त्र को कुमारी के रक्षक को देकर चला जावे ॥१॥२॥ और कुमारी वन में जाकर उसे फेक देवे ॥३॥ “या अकृन्तं- स्त्वष्टा” मंत्र से अन्य नये अखण्ड वस्त्र को अभिमंत्रितकर यज्ञोपवीत की भांति बांह में बांध लेवे ॥४॥ “कृत्रिम०” इत्यादि से १०० दांतवाली कंघी से एक बार केशों को प्रलेखन करे ॥५॥ और “कृतयाम०” इत्यादि से अवसृजन करे ॥६॥ “आशासाना०” इत्यादि से कमर इजरवन बांधे ॥७॥ “इयं वीरुद्” से मधुघ मणि को लाख के लाल रंग से सूत को रंग कर उससे मणि को गांठ कर अनामिका अङ्गुली में पुण्य दिन के अन्त में बांधे ॥८॥ गाँठ के अन्त में मणि हो एवं बाहर ग्रंथि हो ॥९॥ “भग- स्तेवत०” इत्यादि से कुमारी के दहिने हाथ को पकड़ कर कौतुक गृह से बाहर निकाले ॥१०॥ शाखा पर गाड़ी का जूआ धरकर दक्षिण से अन्य पुरुष जूआ को पकड़े रहे, दहिने जूआ के धुरी को उत्तर वाले जूआ के छेद में वह डाभ से गांठकर कुमारी के ललाट में सोना बांध कर “शं त०” मंत्र का जप करे और छिद्र में जल सींचे ॥११॥१२॥१३॥ और अग्नि के उत्तर भाग में जाकर, “अङ्गात्०” आदि मंत्र से जल को ढावे ॥१४॥ और ‘स्योनम्’ इत्यादि मंत्र से गोबर के पिण्ड पर पत्थर