कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ऽश्मानं निदधाति ॥१५॥ तमातिष्ठेत्यास्थाप्य ॥१६॥ इयं नारीति ध्रुवां तिष्ठन्तीं पूल्यान्त्यावापयति ॥१७॥ त्रिरविच्छिन्दन्तीं चतुर्थीं कामाय ॥१८॥ येनाग्निरिति पाणिं ग्राहयति ॥१९॥ अर्यमणं इत्यग्निं त्रिः परिणयति ॥२०॥ सप्त मर्यादा इत्युत्तरतोऽग्नेः सप्त लेखा लिखति प्राच्यः ॥२१॥ तासु पदान्युत्क्रामयति ॥२२॥ इषे त्वा सुमङ्गलि प्रजावति सुसीम इति प्रथमम् ॥२३॥ ऊर्जे त्वा रायस्पोषाय त्वा सौभाग्याय त्वा साम्राज्याय त्वा संपदे त्वा जीवात्वे त्वा सुमङ्गलि प्रजावति सुसीम इति सप्तमं सखा सप्तपदी भवेति ॥२४॥ आरोह तल्पं भगस्ततक्षेति तल्प उपवेशयति ॥२५॥ उपविष्टायाः सुहृत्पादौ प्रक्षालयति ॥२६॥ प्रक्षाल्यमानावतु मन्त्र- यते ॥ इमौ पादौ सुभगौ सुशेवौ सौभाग्याय कृणुतां नो अघाय । प्रक्षाल्यमानौ सुभगौ सुपत्न्याः प्रजां पशून्दीर्घमायुश्च धत्तामिति ॥२७॥ अहं विष्यामि प्र त्वा को धरे ॥ उस पर कुमारी को बिठलाकर “इयं नारी०” इत्यादि मंत्र से कुमारी से अग्नि में लावा और पुल्यों को ढलवावे और “येनाग्नि०” मंत्र से वर कुमारी का पाणिग्रहण करे ॥१५॥१६॥१७॥१८॥ एवं “अर्यमण०” इत्यादि मंत्र से अग्नि की तीन बार परिक्रमा करे ॥ पुनः अग्नि के उत्तर भाग में पश्चिम को “सप्त मर्यादा०” इत्यादि मंत्र से वर सात रेखायें खींचे “उन पर कुमारी को सात पग इस भांति वर वाक्य पढता जावे और कुमारी पहिले दहिना पग आगे रखकर पीछे वाम पग रखती चले”—“इषे त्वा सुमङ्गलि प्रजावति सुसीम०” इससे पहिला पग और ऊर्जे त्वा०” इत्यादि से सप्तम पग धरवाता हुआ “सखा सप्तपदी भव०” अन्त में पढ़े ॥ और तब वर कुमारी को “आरोह तल्पं०” इत्यादि मंत्र पढ़कर शय्या पर बिठलावे ॥१९॥२०॥२१॥२२॥२३॥२४॥२५॥ शय्या पर बैठी हुई कुमारी के पैरों को दासी स्त्री धोवे और “इमौ पादौ