कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १८५
मुञ्चामीति योक्त्रं विचृतति ॥२८॥ अपरस्मिन् भृत्याः संरभन्ते ॥२६॥ ये जयन्ति ते बलीयांस एव मन्यन्ते ॥३०॥ बृहस्पतिनेति सर्वसुरभिचूर्णान्यृचर्चा काम्पील- पलाशेन मूर्धन्यावपति ॥३१॥ उद्यच्छध्वं भगस्ततक्षा- भ्रातृघ्नीमित्येकैकशोत्थापयति ॥३२॥ प्रतितिष्ठेति प्रति- ष्ठापयति ॥३३॥२॥७६॥ सुकिंशुकं रुक्मप्रस्तरणमिति यानमारोहयति ॥१॥ इमं पन्थां ब्रह्मापरमित्यग्रतो ब्रह्मा प्रपद्यते ॥२॥ मा विदन्ननृक्षरा अध्वानमित्युक्तम् ॥३॥ येदं पूर्वेति तेना- न्यस्यामूढायां वाधूयस्य दशां चतुष्पथे दक्षिणैरभि- तिष्ठति ॥४॥ स चेदुभयोः शुभकामो भवति सूर्यायै देवे- भ्य इह्यताम