भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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पृष्ठ 218

१८६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । यतोऽन्तरा ब्रह्माणम् ॥६॥ य ऋते चिदभिश्रिष इति यानं संप्रोक्ष्य विनिष्कारयति ॥७॥ सा मन्दसानेति तीर्थे लोगं प्रविध्यति ॥८॥ इदं सु म इति महावृक्षेषु जपति ॥६॥ सुमङ्गलीरिति वध्वीक्षीः प्रति जपति ॥१०॥ या ओषधय इति मन्त्रोक्तेषु ॥११॥ ये पितर इति श्मशा- नेषु ॥१२॥ प्र बुध्यस्वेति सुप्तां प्रबोधयेत् ॥१३॥ सं काश- यामीति गृहसंकाशे जपति ॥१४॥ उद्ध ऊर्मिरिति यानं सम्प्रोक्ष्य विमोचयति ॥१५॥ उत्तिष्ठेत इति पत्नी शालां सम्प्रोक्षति ॥१६॥ स्योनमिति दक्षिणतो वलीकानां शकृ- त्पिण्डेऽश्मानं निदधाति ॥१७॥ तस्योपरि मध्यमपलाशे सर्पिषि चत्वारि दूर्वाग्राणि ॥१८॥ तमातिष्ठेत्या- स्थाप्य ॥१९॥ सुमङ्गली प्रतरणीह प्रियं मा हिंसिष्टं ब्रह्मापरमिति प्रत्यृचं प्रपादयति ॥२०॥ सुहृत्पूर्णकंसेन इत्यादि मंत्र से ब्राह्मण को, “य ऋतेचिदभिश्रिष०” मंत्र से सवारी को जल से भलीभांति प्रोक्षण कर साफ कर देवे ॥६॥७॥ और रास्ते में यदि तीर्थ मिले तो वहाँ “सा मन्दसान०” को पढ़ कर मट्टी का ढेला फेक देवे ॥८॥ वृक्षों को देखने पर “इदं सु म०” का जप करे ॥९॥ 'सुमङ्गलीः' को वधू को देखने वाली स्त्री को देखने पर जप करे ॥१०॥ “या ओष- धय०” का जप करे- जहाँ तहाँ ॥११॥ मरघट मिलने पर “ये पितर०” इत्यादि का जप करे ॥१२॥ “प्रबुध्यस्व०” पढकर सोती हुई वधू को जगावे ॥१३॥ संकाशयामि०” का जप जब वर के घर पास आ जावे तब करे ॥१४॥ “उद्ध ऊर्मिः०” इत्यादि को पढ़कर सवारी को जल से धोकर उसमें दुलहिन उतार लेवे ॥१५॥ “उत्तिष्ठेत०” मंत्र को वर पढ़े एवं पत्नी शाला को प्रोक्षण करे ॥१६॥ और दक्षिणभाग में बैल के गोबर के पिण्ड पर “स्योनं०” मंत्र से पत्थर को धर उसपर कर मध्यम पलाश के काठ में घृत धर और “तमातिष्ठ०” मंत्र से दूर्वा के अग्रभागों धरकर “सुमङ्गली०” इत्यादि ऋचाओं में से प्रत्येक ऋ० से ब्रह्मा वधू को एक पग बढ़वावे और उसे कोई सुहृत् कांसे के पात्र से अग्नि की चारों ओर