कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १८७ प्रतिपादयति ॥२१॥ अघोरचक्षुरित्यग्निं त्रिः परिणयति ॥२२॥ यदा गार्हपत्यं सूर्यायै देवेभ्य इति मन्त्रोक्तेभ्यो नमस्कुर्वतीमनुमन्त्रयते ॥२३॥३॥७७॥ शर्म वर्मेति रोहितचर्माहरन्तम् ॥१॥ चर्म चोपस्तृणी- थनेत्युपस्तृणन्तम् ॥२॥ यं बल्वजमिति बल्वजं न्यस्य- न्तम् ॥ ३॥ उप स्तृणीहीत्युपस्तृणन्तम् ॥४॥ तदा रोहत्वि- त्यारोहयति ॥५॥ तत्रोपविश्येत्युपवेशयति ॥६॥ दक्षि- णोत्तरमुपस्थं कुरुते ॥७॥ सुज्यैष्ठ्य इति कल्याणनामानं ब्राह्मणाायनमुपस्थ उपवेशयति ॥ ८ ॥ वितिष्ठन्तामिति प्रमदनं प्रमायोत्थापयति ॥६॥ तेन भूतेन तुभ्यमग्रे शुम्भ- नी अग्निर्जनविन्मह्यं जायामिमामदात्सोमोवसुविन्म- हं जायामिमामदात्पूषा जातिविन्मह्यं जायामिमामदा- दिन्द्रः सहीयान्मह्यं जायामिमामदादग्नये जनविदे स्वा- हा सोमाय वसुविदे स्वाहा पूष्णे जातिविदे स्वाहेन्द्राय सहीयसे स्वाहेत्यागच्छतः ॥१०॥ सविता प्रसवानामि- “अघोरचक्षुः०” से तीन वार परिक्रमण करावे ॥१७—२२॥ और घर के कुल देवता को बहू नमस्कार करती समय कर्त्ता “यदा गार्हपत्यं०” इत्यादि मं० से अनुमंत्रण करे ॥२३॥३॥७७॥ यह सतहत्तरवी कण्डिका पूरी हुई । “शर्मवर्म०” इत्यादि मंत्र से लाल बैल के चर्म को लाते हुए पढ़े, “चर्म चोपस्तृणीथन०” इत्यादि मंत्र से चर्म बिछाते समय पढ़े । और तृणों को लाते समय “यं बल्वजं०” इत्यादि पढ़े । जमीन पर प्रथम तृणों को बिछाकर उस पर चर्म को बिछावे । “आरोहतु” कह कर उसपर आरोहण कराकर “तत्रोपविश०” से उसपर उसे बिठलावे और कल्याण-वाचक नाम वाले ब्राह्मणायन के उत्तर मुख गोद में “सुज्यै- ष्ठ्य०” मंत्र से वर-वधू को बिठाकर “वितिष्ठन्ताम्०” से कुमार के लिये फल, मोदकादि देकर तब उसे उठावे ॥१—९॥ “तेन भूतेन०” इत्यादि मंत्रों से वर वधू के आते समय आहुतियां देवे । एवं “सविता