कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ति मूर्ध्नोः संपातानानयति ॥११॥ उदपात्र उत्तरान् ॥१२॥ शुम्भन्द्याञ्जल्योर्निंनयति ॥१३॥ तेन भूतेनेति समशनम् ॥१४॥ रसानाशयति स्थालीपाकं च ॥१५॥ यवानामाज्यमिश्राणां पूर्णाञ्जलिं जुहोति ॥१६॥४॥७८॥ सप्त मर्यादा इति तिसृणां प्रातरावपते ॥१॥ अक्ष्यौ नाविति समाञ्जाते ॥२॥ महीम् ष्विति तल्पमालम्भ- यति ॥३॥ आरोह तल्पमित्यारोहयति ॥४॥ तत्रोप- विश्येत्युपवेशयति ॥५॥ देवा अग्रे इति संवेशयति ॥६॥ अभित्वेत्यभिच्छादयति ॥७॥ सं पितराविति समावेश- यति ॥८॥ इहेमाविति त्रिः सन्नुदति ॥६॥ मधुघमणिमौ- क्षेडपनीयेयं वीरुदमोऽहमिति संस्पृशतः ॥१०॥ ब्रह्म- प्रसवानां०” इत्यादि से दोनों के शिरों पर आहुतियों का ढार देवे ॥१०॥११॥ “तेन भूतेन०” से रसों और स्थाली पाक का दोनों को भोजन करावे ॥१२॥१३॥१४॥१५॥ और आठ ऋ० वाले कल्पजसूक्त, एवं “आगच्छत०” इत्यादि ३ ऋ० वाले सूक्त और “सविता प्रसवानां०” सूक्त–इन सूक्तों से यव मिले आज्य की अञ्जुलियों से वर वधू हवन करें और सम्पातों को वर वधू के शिर पर डालते जावें ॥१६॥४॥७८॥ यह अठहत्तरवी कण्डिका पूरी हुई । “सप्त मर्यादा०” इत्यादि ऋ० से प्रातःकाल आहुति करें । “अक्ष्यौ नौ०” से दोनों परस्पर एक दूसरे को कज्जल से नेत्रों में अञ्जन करें ॥१॥२॥ और “महीमूषु०” से शय्या को स्पर्श करें । “आरोह तल्प०” कहने पर शय्यापर चढ़ावें “तत्रोपविशेत्” कहने पर–उन्हें बिठलावे और “देवा अग्रे०” पढ़कर दोनों को शय्या पर संवेशन करावे ॥६॥ “अभित्वामनुजातेन०” से दोनों को वस्त्र ओढ़ा देवे ॥७॥ “संपितरौ०” इत्यादि ४ ऋचाओं से दोनों को एक दूसरे के मुख सम्मुख करे ॥८॥ “इहेमौ०” से एक दूसरे के कण्ठ को ग्रहण करे ॥६॥ मधुघ-मणि को सुगन्ध में डालकर पीसकर उबटन बनाकर “इयं वीरुत्०” इस सूक्त से दोनों को उबटन लगावे ॥ “अमोऽहं०” इस दो ऋचा से अक्षत पढ़कर