कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
पृष्ठ 221, कुल 361 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १८९ जज्ञानमित्यङ्गुष्ठेन व्यचस्करोति ॥११॥ स्योनाद्योनेरित्यु- त्थापयति॥१२॥परिधापनीयाभ्यामहतेनाच्छादयति॥१३॥ बृहस्पतिरिति शष्पेणाभिघार्य व्रीहियवाभ्यामभिनि- धाय दर्भपिञ्जूल्या सीमन्तं विवृतति ॥१४॥ शणशक- लेन परिवेष्ट्य तिस्रो रात्रीः प्रति सुप्तास्ते ॥१५॥ अनु- वाकाभ्यामन्वारब्धाभ्यामुपदधीत ॥१६॥ इहेदसाथेत्येत- या शुल्कमपाकृत्य ॥१७॥ द्वाभ्यां निवर्तयतीह मम राध्य- तामत्र तवेति ॥१८॥ यथा वा मन्यन्ते ॥१९॥ परा देही- ति वाधूर्यं ददतमनुमन्त्रयते ॥२०॥ देवैर्दत्तमिति प्रति- गृह्णाति ॥२१॥ अपास्मत्तम इति स्थाणावासजति ॥२२॥ एक दूसरे को कण्ठ ग्रहण करे और “ब्रह्म जज्ञानं०” से वर वधू के नाभि प्रदेश को ( जननेन्द्रिय को ) स्पर्श करे ॥१०॥११॥ “स्योनाद्योनेः०” से दोनों को उठावे ॥१२॥ “या अकृन्तन्नत्वष्टा वासो०” इत्यादि दो ऋ० से दोनों के अखण्ड नये वस्त्रों को ओढ़ा देवे ॥ “बृहस्पति०” इत्यादि मंत्र से शष्प द्वारा अभिधारण कर व्रीहि और यवों का दर्भ पिञ्जुलि से वधू के मांग को ( सीमन्त ) केशों को शिर के बीचो बीच दोनों ओर फाड़कर सज देवे ॥१३॥१४॥ शण के टुकड़े से वधू के जूड़े को लपेट कर बान्ध देवे और तीन रात्रि दोनों साथ सोवें ॥१५॥ सब कर्म- काण्डों में आज्य की आहुति होती है । परन्तु तन्त्र की विधि है “आज्य, समिध, पुरोडाश, व्रीहि, यव, तिल आदि में से किसी एक से आहुति देवे । अतएव आज्य आदि १३ हविष्य वस्तुओं में से-किसी एक की “सत्येनोत्तभित०” इन दो अनुवाकों से आहुतियाँ देवे ॥१६॥ यदि चतुर्थी कर्म के भीतर वधू रजस्वला हो जावे तो उसका प्रायश्चित करे ॥ “इहे- दसाथ०” ऋचा से वर वधू को अलग २ दहेज देवे ॥१७॥ “द्वाभ्यां निवर्तयतीह०” इत्यादि वर पढ़े ॥१८॥ या जैसा चाहें वैसा करें ॥१९॥ “परादेहि०” से बहू को पहनने को वस्त्र देते समय अनुमंत्रण करे । और “देवैर्दत्तं०” से वस्त्र को ग्रहण करे ॥२०॥२१॥ “अपास्मत्तम०” से वस्त्र को वर वधू के शरीरों पर डाल देवे ॥२२॥ “यावतीः कृत्या०”