भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

पृष्ठ 222, कुल 361 में से

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१९० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । यावतीः कृत्या इति व्रजेत् ॥२३॥ या मे प्रियतमेति वृक्षं प्रतिच्छादयति ॥२४॥ शुम्भन्त्याप्लुत्य ॥२५॥ ये अन्ता इत्याच्छादयति ॥२६॥ नवं वसान इत्याव्रजति ॥२७॥ पूर्वापरं यत्र नाधिगच्छेदब्रह्मापरमिति कुर्यात् ॥२८॥ गौर्दक्षिणा प्रतीवाहः ॥२९॥ जीवं रुदन्ति यदिमे केशिन इति जुहोति ॥३०॥ एष सौर्यो विवाहः ॥३१॥ ब्रह्माप- रमिति ब्राह्म्यः ॥३२॥ आवृत्तः प्राजापत्याः प्राजापत्याः ॥३३॥५॥७६॥ इत्यथर्ववेदे कौशिकसूत्रे दशमोऽध्यायः समाप्तः ॥१०॥ अथ पितृमेधं व्याख्यास्यामः ॥१॥ दहननिधानदेशे- परिवृक्षाणि निधानकाल इति ब्राह्मणोक्तम् ॥२॥ दुर्बली- से वस्त्रों को लेकर चले ॥२३॥ “या मे प्रियतम०” से वस्त्र से वृक्ष को ढाके, “नवं वसान०” पढ़कर आवै, यदि पुरोहित विवाह कर्म कराने में पूर्वापर कर्म का अनुक्रम न जाने तो “ब्रह्मापरं०” इत्यादि ऋ० से कर्म करावे और अभ्यातानादि उत्तर तंत्र, हस्तहोम, मंत्रों का विकल्प और यदि पूर्वस्थण्डिल में अग्नि करे तो उत्तर तंत्र करना चाहिये और “कामस्तदग्र०” इत्यादि काम सूक्त का जप करे ॥२४—२८॥ कर्त्ता ( पुरोहित ) को गौदक्षिणा देवे ॥२९॥ यदि वधू पिता घर पर रोवे तो “जीवं रुदन्ति०” इत्यादि से आहुतियाँ देवे ॥३०॥ यह “सौर्यविवाह” कहलाता है ॥३१॥ “ब्रह्मापरं०” इत्यादि से जो विवाह होता है वह “ब्राह्म्य” विवाह कहलाता है ॥३२॥ विना मंत्र के जो विवाह होता है वह प्राजापत्यविवाह होता है या शूद्र का विवाह है ॥३३॥५॥७६॥ इय उन्यासीवी कण्डिका समाप्त हुई । यह अथर्ववेद के कौशिक सूत्र का दशम अध्याय समाप्त हुआ ॥१०॥ अब अन्त्येष्टि कर्म्म को कहेंगे । वृक्ष रहित प्रदेश में दहन स्थान बनावे—ऐसा ब्राह्मण ग्रन्थ में लिखा है ॥१॥२॥ जब पित आदि दुर्बल

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