भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १९१ भवन्तं शालातृणेषु दर्भानास्तीर्य स्योनास्मै भवेत्यवरोह- यति ॥३॥ मन्त्रोक्तावनुमन्त्रयते ॥४॥ यत्ते कृष्ण इत्यव- दीपयति ॥५॥ आहिताग्नौ प्रेते सम्भारान् सम्भरति ॥६॥ आज्यं च पृषदाज्यं चाजं च गां च ॥७॥ वसनं पञ्चमम् ॥८॥ हिरण्यं षष्ठम् ॥६॥ शरीरं नान्वालभते ॥१०॥ अन्यं चेष्टन्तमकुमन्त्रयते ॥११॥ शान्त्युदकं करोत्यसकलं चातनानां चान्त्वावपते ॥१२॥ शान्त्युदकोदकेन केशश्म- श्रुरोमनखानि संहारयन्ति ॥१३॥ आप्लावयन्ति ॥१४॥ अनुलिम्पन्ति ॥१५॥ स्रजोऽभिहरन्ति ॥१६॥ एवं स्नातम्- लंकृतमहतेनावाग्दशेन वसनेन प्रच्छादयत्येतत्ते देव एत- अर्थात् मृत्यु को प्राप्त हो जावें या मरणापन्न हो जावें ( यह संस्कार आहिताग्नि और एकाग्नि का है) तो अग्निशाला या आवसथ्यशाला में शाला तृणों को बिछाकर उस पर दर्भ तृणों को डालकर “स्योनास्मै भव०” इत्यादि से मृत वा मरणापन्न को उस बिछाये तृणों पर अवरोहण करावे ॥३॥४॥ “यत्ते कृष्ण०” से दीप जला देवे ॥५॥ यदि काक, पिपीलिका, सर्प, व्याघ्र, सींग वाले जन्तु, श्वापद, आदि जन्तुओं के सींग, नख, दन्त आदि के काटने से मनुष्य का मृत्यु होवे, तो उसका प्रायश्चित्त इस प्रकार होगा “यत्ते कृष्णः शकुनि०” इत्यादि ३ ऋचा से अग्नि को अभिमंत्रित कर दंशित-व्रण को उससे जला देवे ॥६॥• आहि- ताग्नि के मरने पर वक्ष्यमाण सामग्रियों को एकत्र कर रक्खे ॥६॥ शुद्ध अग्नि, दर्भ, तिल, घृत, हिरण्य शकल, चन्दनकाठ, गोपीचन्दन, तुलसी, पिष्ट, ताम्रपात्र, गोबर, कुदार, अखण्ड नयावस्त्र, सूत ॥७॥८॥९॥ सात कुर्सी के भीतर के व्यक्तियों को अन्य लोग बिना शुद्ध हुए नहीं स्पर्श करते हैं ॥१०॥ चेष्टा करते हुए अन्य व्यक्ति को अनुमंत्रण करे ॥११॥ कर्त्ता सकल प्रतीकत्रय से और ओषधित्रय से मातृ नाम प्रतीकत्रय को शान्त्युदक में आवपन करे ॥१२॥ शान्ति जल से, शिरके केश, दाढ़ी, मूँछ, लोम और नखों को कटवावे ॥१३॥ और प्रेत शरीर को जलाशय में डुबाकर स्नान करावें ॥१४॥ श्मशान भूमि को लीपे और स्रज से अग्नि को लावे ॥१४॥१५॥१६॥ इस भाँति नहवा धोलाकर के अखण्ड