कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । त्वा वासः प्रथमं न्वागन्निति ॥१७॥ अपेममित्यग्निषु जुहोति ॥१८॥ उखाः कुर्वन्ति ॥१९॥ ताः शकृदाभ्यन्तरं लिम्पन्ति शुष्केण वा पूरयन्ति ॥२०॥ ताः पृथगग्निभिः संतापयन्त्या शकृदादीपनात् ॥२१॥ तेषां हरणानुपूर्व- माहवनीयं प्रथमं ततो दक्षिणाग्निं ततो गार्हपत्यम् ॥ ॥२२॥ अथ विदेशे प्रेतस्या रोहत जनित्रीं जातवेदस इति पृथगरण्योश्वग्नीन्समारोपयन्ति ॥२३॥ तेषु यथोक्तं क- रोति ॥२४॥ अपि वान्यवत्साया वा संधिनीक्षीरेणैक- शालाकेन वा मन्थेनाग्निहोत्रं जुहोत्या दहनात् ॥२५॥ दर्शपूर्णमासयोः कृष्णकतण्डुलानां तस्या आज्येन नान्तं न बहिः ॥२६॥ पलालानि बर्हिः ॥२७॥ तिल्पिञ्ज्या इध्माः ॥२८॥ ग्रहानाज्यभागौ पुरस्ताद्धोमसंस्थितहोमानुद्धृत्य ॥२९॥ प्राणापानावुरुद्ध्यै निधनाभिर्जुहुयात् ॥३०॥ अथो- चीरे दार नये वस्त्र से “एतत्ते देव०” मंत्र से प्रेत को ढाक देवे ॥१७॥ “अपेमं०” मंत्र से अग्नि में आहुतियाँ देवे ॥१८॥ और “उखायें” तय्यार करे ॥१९॥ उखाओं को गोबर से लीप देवे या सूखे गोबर से उनको भर देवे ॥२०॥ उनमें एकही वार में अग्नि डाल कर सूखे गोबर को जलावे ॥२१॥ उनका हरणानुक्रम से आहवनीय अग्नि को पहिले। तब दक्षिणाग्नि को और अन्त में गार्हपत्याग्नि को ॥२२॥ यदि देशान्तर में मृत्यु हो तो आहिताग्नि का कर्म इस भाँति करे। “प्रेतस्यारोहत०” मंत्र से अरणी द्वारा अग्नि उत्पन्न कर उनमें यथोक्त प्रकार से कर्म करे ॥२३॥२४॥ अथवा अन्य वत्सा को गौ के पास धरकर जो दूध दूहा जाता—ऐसी गौ के दूध से एक शला का द्वारा या मन्थ से अग्निहोत्र की आहुति करे जब तक प्रेत का दाह होता रहे ॥२५॥ दर्शपूर्णमास में काले चावलों की उक्त गौ के दूध से न अन्त में न बाहर आहुति करे ॥२६॥ पलालौ से बर्हि होम करे ॥२७॥ तिल के डांठ का इध्म करे ॥२८॥ ग्रह होम, आज्यभाग के होम, पुरस्तात् होम, संस्थित होमों को निकाल कर, प्राण, अपान वायु को रोककर निधनाग्नि से आहुति करे ॥२९॥३०॥