भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

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अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १९३


भयोरुत्तिष्ठेत्युत्थापयति ॥३१॥ प्रच्यवस्वेति त्रिः संहा- पयति यावत्कृत्वश्चोत्थापयति ॥३२॥ एवमेव कूर्दी जघने निबध्य ॥३३॥ इमौ युनज्मीति गावौ युनक्ति पुरुषौ वा ॥३४॥ उत्तिष्ठ प्रेहि प्रच्यवस्वोदन्वतीत एतेऽग्नीषोमेदं पूर्वमिति हरिणीभिर्हरेयुरति द्रवेत्यष्टभिः ॥३५॥ इदं त इत्यग्निमग्रतः ॥३६॥ प्रजानत्यद्य इति जघन्यं गामे- धमग्निं परिणीय ॥३७॥ स्योनास्मै भवेत्युत्तरतोऽग्नेः शरीरं निदधाति ॥३८॥ अध्वर्यव इष्टिं निर्वपन्ति ॥३९॥ तस्यां यथादेवतं पुरस्ताद्धोमसंस्थितहोमानुद्धृत्य ॥४०॥ प्राणापानावरुद्ध्यै निघनाभिर्जुहुयात् ॥४१॥ अथोभयो- रपेत ददामीति शान्त्युदकं कृत्वा सम्प्रोक्षणीभ्यां काम्पी- लशाखया दहनं सम्प्रोक्ष्य ॥४२॥ उदीरतामित्युद्धृत्या- भ्युक्ष्य लक्षणं कृत्वा पुनरभ्युक्ष्य प्राग्दक्षिणमेधश्चिन्वन्ति ॥४३॥ इयं नारीति पत्नीमुपसंवेशयति ॥४४॥ उदीष्र्वेत्यु-

॥३०॥ अब “उभयोरुत्तिष्ठेत्०” मंत्र से दोनों का उत्थापन करे ॥३१॥ इसी प्रकार कूर्दी को जंघे में बान्धकर “इमौ युञ्जि०” मंत्र से दो गौ या दो पुरुषों को गाड़ी में जोते ॥३२॥३३॥३४॥ “उत्तिष्ठ प्रेहि०” इत्यादि से हरिणी से कलश को उठाकर “द्रव०” इत्यादि आठ ऋचाओं से हड्डियों को अभिमंत्रित करके “इदं त०” से प्रेत के आगे अग्नि को धर कर “प्रजानत्यद्य०” से जघन्य गौ को अग्नि की परिक्रमा करके “स्यो- नास्मै भव०” से अग्नि के उत्तर भाग में शरीर को रख देवे ॥३५॥३६॥ ३७॥३८॥ और अध्वर्युगण इष्टि को निर्वपन करें ॥३९॥ पुरस्तात् होम और संस्थित होमों को निकाल कर प्राणापान को रोककर निघनाग्नि से आहुति देवे ॥४०॥४१॥ “अथोभयोरपेत ददामि०” से शान्ति उदक को करके संप्रोक्षणियों से काम्पील शाखा द्वारा दहन स्थान का मार्जन करके ॥४२॥ “उदीरतां०” इत्यादि से अभ्युक्षण कर रेखा खींच कर पुनः मार्जन करके पूर्व दक्षिण भाग में समिधों को आधान करे और “इयं नारी०” मंत्र से पत्नी को मरणार्थ प्रेत के स्थान सोला देवे ॥४३॥४४॥ “उदीष्र्वं०” २५