कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । त्थापयति ॥४५॥ यद्धिरण्यं बिभर्ति तद्दक्षिणे पाणावा- दायाज्येनाभिघार्य ज्येष्ठेन पुत्रेणादापयतीदं हिरण्यमिति ॥४६॥ स्वर्गं यत इति दक्षिणं हस्तं निर्मार्जयति ॥४७॥ दण्डं हस्तादिति मन्त्रोक्तं ब्राह्मणस्यादापयति ॥४८॥ धनुर्हस्तादिति क्षत्रियस्य ॥४९॥ अष्ट्रामिति वैश्यस्य ॥५०॥ इदं पितृभ्य इति दर्भानेधान्स्तृणाति ॥५१॥ तत्रैनमुत्तानमादधीतेजानश्चित्तमारुक्षदग्निमिति ॥५२॥ प्राच्यां त्वा दिशीति प्रतिदिशम् ॥५३॥ नेत्युपरिबभ्रवः ॥५४॥ अनुमन्त्रयते ॥५५॥ अथास्य सप्तसु प्राणेषु सप्त हिरण्यशकलान्यवास्यत्यमृतमस्यमृतत्वायामृतमस्मिन्धे- हीति ॥५६॥॥८०॥ अथाहिताग्नेदर्भेषु कृष्णाजिनमन्तर्लोमास्तीर्य ॥१॥ तत्रैनमुत्तानमाधाय ॥२॥ अथास्य यज्ञपात्राणि पृषदा- मंत्र से उसे उठावे ॥४५॥ और जो सोने का भूषण पहने हो उसको दहिने हाथ में लेकर आज्य के साथ घी का धार देकर जेठे पुत्र द्वारा “इदं हिरण्यं०” मंत्र पढ़कर दिलवावे ॥४६॥ “स्वर्गं यतः०” से दहिने हाथ को मार्जन करे ॥४७॥ “दण्डं हस्तात्०” मंत्रोक्त विधि से ब्राह्मण का दिलवावे “धनुर्हस्तात्०” से क्षत्रिय का और “अष्ट्रां०” से वैश्य का ॥४८॥४९॥५०॥ “इदं पितृभ्यः०” डाभ तृणों का आस्तरण करे ॥५१॥ उन बिछाये हुए कुशों पर “जानश्चित्तमारुक्षदग्निं०” से प्रेत को चित्त ( उत्तान ) डाल देवे ॥५२॥ “प्राच्यां त्वा दिशि०” से प्रति दिशा में करे ॥५३॥ “उपरिबभ्रवः” आचार्य्यगण ऐसा नहीं करते ॥५४॥ अनु- मंत्रण करे ॥५५॥ अब १ मुख, २ कान, दो नाक के छिद्र और दो नेत्र इन सात प्राणों में सोने के सात टुकड़ों को “अमृतमसि०” इत्यादि से डाले ॥५६॥॥८०॥ यह अस्सीवी कण्डिका समाप्त हुई ॥ अब आहिताग्नि के अग्नि के पास बिछाये हुए कुशों पर काले मृग- चर्म को लोम ऊपर को करके बिछा देवे ॥१॥ उस पर प्रेत को उत्तान रख देवे ॥२॥ और इसके यज्ञपात्रों को पृषदाज्य से पूरा करके अनुरूप