भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

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१९६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । स्याद्धस्त्यति द्रव श्वानाचिति ॥२२॥ दक्षिणे दक्षिणं सव्ये सव्यम् ॥२३॥ हृदये हृदयम् ॥२४॥ अग्नेर्वर्मेति वपया सप्तच्छिद्रया मुखं प्रच्छादयन्ति ॥२५॥ यथागात्रं गात्राणि ॥२६॥ दक्षिणैर्दक्षिणानि सव्यैः सव्यानि ॥२७॥ अनुबद्धशिरःपादेन गोशालां चर्मणावच्छाद्य ॥२८॥ अजो भाग उत्त्वा वहन्त्विति दक्षिणतोऽजं बध्नाति ॥२९॥ अस्माद्वै त्वमजायथा अयं त्वदधि जायतामसौ स्वाहे- त्युरसि गृहे जुहोति ॥३०॥ तथाग्निषु जुहोत्यग्नये स्वाहा कामाय स्वाहा लोकाय स्वाहेति ॥३१॥ दक्षिणाग्नावि- त्येके ॥३२॥ मैनमग्ने वि दहः शं तप आरभस्व प्रजानन्त इति कनिष्ठ आदीपयति ॥३३॥ आदीप्ते स्रुवेण यामान् होमाञ्जुहोति परेयिवांसं प्रवतो महोरिति ॥३४॥ यमो नो गातुं प्रथमो विवेदेति द्वे प्रथमे ॥३५॥ अङ्गिरसो नः पितरो नवग्वा इति संहिताः सप्त ॥३६॥ यो ममार हाथों पर “अतिद्रव श्वानौ०” से दहिने पर दहिने को, वाम पर वाम को ॥२२॥२३॥ हृदय पर हृदय को “अग्नेर्वर्म०” से वपा द्वारा सात छिद्रों को ढाक देवे ॥२४॥२५॥ जिस प्रकार शरीर के अंग हैं उसी प्रकार प्रत्येक अंगों को घरे ॥२६॥ दहिने पर दहिनों को, बायें पर बायों को घरे ॥२७॥ शिर पैरों को बांधकर गौ को गोशाला में चमड़े से ढाक देकर “अजो भाग उत्त्वा वहन्तु०” से दक्षिणभाग में बकरे को बान्धे ॥२९॥ “अस्माद्वै०” से हृदय पर आहुति देवे ॥३०॥ उसी प्रकार अग्नये स्वाहा०” इत्यादि से अग्नियों में आहुतियाँ देंवे ॥३१॥ दक्षिणाग्नि में आहुति देवे—ऐसा कोई २ आचार्य कहते हैं ॥ ३२ ॥ “मैनमग्ने विदह०” इत्यादि से सब से छोटा पुत्र अग्नि प्रज्वलित करे ॥ ३३ ॥ अग्नि प्रज्वलित हो जाने पर स्रुव से “परेयिवांसं प्रवतो महीः०” मंत्र से याम होमों की आहुतियाँ देवे ॥३४॥ “यमो नो गातुं०” इत्यादि पहिली दो आहुतियाँ देवे ॥३५॥ “अङ्गिरसो नः पितरो नवग्वा”इत्यादि से लगा- तार ७ आहुतियाँ देवे ॥३६॥ “यो ममार प्रथमो मर्त्यानां०” इत्यादि से