कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १९७ प्रथमो मर्त्यानां ये नः पितुः पितरो ये पितामहा इत्येकादश ॥३७॥ अथ सारस्वताः ॥३८॥ सरस्वतीं देवयन्तो हवन्ते सरस्वतीं पितरो हवन्ते सरस्वति या सरथं ययाथ सरस्वति व्रतेषु त इदं ते हव्यं घृतवत्सर- स्वतीन्द्रो मा मरुत्वानिति ॥३६॥ दक्षिणतोऽन्यस्मिन्न- नुष्ठाता जुहोति ॥४०॥ सर्वैरुपतिष्ठन्ति त्रीणि प्रभृति- भिर्वा ॥४१॥ अपि वानुष्ठानीभिः ॥४२॥ एता अनुष्ठान्यः ॥४३॥ मैनमग्ने वि दह इति प्रभृत्यव सृजेति वर्जयित्वा सहस्रनीथा इत्यतः ॥४४॥ आ रोहत जनित्रीं जातवे- दस इति पञ्चदशभिराहिताग्निम् ॥४५॥ मित्रावरुणा परि मामधातामिति पाणी प्रक्षालयते ॥४६॥ वर्चसा मामित्याचामति ॥४७॥ विवस्वान्न इत्युत्तरतोऽन्यस्मि- न्ननुष्ठाता जुहोति ॥४८॥२॥८१॥ यवीयः प्रथमानि कर्माणि प्राङ्मुखानां यज्ञोपवीतिनां दक्षिणावृताम् ॥१॥ अथैषां सप्तसप्त शर्कराः पाणिष्वाव- ११ आहुतियाँ देवे ॥३७॥ अब सारस्वत हवन करे ॥३८॥ “सरस्वतीं देवयन्तो हवन्ते०” इत्यादि मंत्रों से दक्षिण भाग में आहुतियाँ देवे और दूसरे अग्नि में अनुष्ठाता आहुति देवे ॥३८॥३९॥ ४० सब मंत्रों से या तीन मंत्रों से उपस्थान करें ॥४१॥ या अनुष्ठानी ऋचाओं से उपस्थान करें ॥४२॥ ये अनुष्ठानी ऋचायें हैं ॥४३॥ “मैनमग्ने विदह०” इत्यादि से “अवसृज०” तक छोड़ कर सहस्रनीथा०” इत्यादि तक जानो ॥४४॥ “आ रोहत जनित्रीं जातवेदस०” इत्यादि १५ ऋचाओं से आहिताग्नि को उपस्थान करे ॥४५॥ “मित्रावरुणा०” इत्यादि से दोनों हाथों को प्रक्षालन करे ॥४६॥ “वर्चसा मां०” इत्यादि से आचमन करे ॥४७॥ “विवस्वान्न०” से उत्तरभाग में आहुति करे और अन्य अग्नि में अनु- ष्ठाता आहुति करे ॥४८॥२॥८१॥ यह एक्यासीवी काण्डका खतम हुई । बड़े प्रथम कर्मों को पूर्वमुख हो यज्ञोपवीती होकर दक्षिणावृत्त होप्र