भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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पृष्ठ 230

१९८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।

पते ॥२॥ तासामेकैकां सव्येनावाचीनहस्तेनावकिरन्तो- ऽनवेक्षमाणा व्रजन्ति ॥३॥ अपाघेनानुमन्त्रयते ॥४॥ सर्वे- ऽग्रतो ब्राह्मणा व्रजन्ति ॥५॥ मा प्र गामेति जपन्त उद्- कान्ते व्यपाचे जपन्ति ॥६॥ पश्चाद्वसिञ्चति ॥७॥ उदु- त्तममिति ज्येष्ठः ॥८॥ पयस्वतीरिति ब्रह्मोक्ताः पिञ्जूली- रावपति ॥६॥ शान्त्युदकेनाचम्याभ्युक्ष्याश्वावतीमिति नदीं तारयते ॥१०॥ नक्षत्रं दृष्ट्वोपतिष्ठते नक्षत्राणां मा संकाशश्च प्रतीकाशश्चावतामिति ॥११॥ शाम्याकीः समि- ध आधायाग्रतो ब्रह्मा जपति ॥१२॥ यस्य श्रया गतमनुप्र- यन्ति देवा मनुष्याः पशवश्च सर्वे । तं नो देवं मनो अधि- ब्रवीतु सुनीतिर्नो नयतु द्विषते मा रधामेति शान्त्यु दकेनाच- म्याभ्युक्ष्य ॥१३॥ निस्सालामिति शालानिवेशनं सम्प्रोक्ष्य ॥१४॥ ऊर्जं बिभ्रदिति प्रपादयति ॥१५॥ नदीमालम्भ-


करे ॥१॥ अब इनके सात २ टुकड़े हाथों पर आवपन करे ॥२॥ उनमें से एक २ को वाम हाथ नीचे करके अवकिरण (छींटें-बखेरें) करते हुए इधर उधर न देखते हुए जावे ॥३॥ और “अपाघेन०” मंत्र से अनुमंत्रण करें ॥४॥ सब के आगे २ ब्राह्मण गण जावें ॥५॥ “मा प्र गाम०” इत्यादि का जप करते हुए जल के पास पहुँच कर जप करें ॥६॥ पीछे जल का सेक करे ॥७॥ “उदुत्तमं०” इत्यादि से जेठा जप करे ॥८॥ “पयस्वतीः०” से ब्राह्मण के कहने पर पिञ्जुलियों का आवपन करे ॥९॥ शान्ति जल से आचमन करके अभ्युक्षण कर “अश्वावतीं०” ऋचा से नदी को पार करे ॥१०॥ नक्षत्र को देख कर “नक्षत्राणां०” इत्यादि से उपस्थान करे ॥११॥ शाम्याकी समिधों का आधान करके आगे ब्रह्मा जप करे ॥१२॥ अर्थात् वक्ष्यमाण मंत्र का जप करे-“यस्य श्रया०” इत्यादि मंत्र का जप करके शान्ति जल से आचमन और अभ्युक्षण करके “निस्सालां०” शाला में निवास करे और उसका संप्रोक्षण करके “ऊर्जं बिभ्रदिति०” से टहले ॥१३॥१४॥१५॥ नदी को स्पर्श करे एवं गौ,