कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
पृष्ठ 231, कुल 361 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १९९ यति गामग्निमश्मानं च ॥१६॥ यवोऽसि यवयास्मद्वेषो यवयारातिमिति यवान् ॥१७॥ खल्वकास्येति खल्वा- न्खलकुलांश्च ॥१८॥ व्यपाद्याभ्यां शाम्याकीराधाप- यति ॥१९॥ तासां धूमं भक्षयन्ति ॥२०॥ यद्यत्क्रव्याद् गृह्णेद्यदि क्रव्यादान् नान्तेऽपरेद्युः । दिवो नभः शुक्रं पयो दुहाना इषमूर्जं पिन्वमानाः ॥ अपां योनिमपाध्वं स्वधा याश्चकृषे जीवंस्तास्ते सन्तु मधुश्चुत इत्यग्नौ स्थालीपाकं निष्पुणाति ॥२१॥ आदहने चापि वान्यवत्सां दोहयित्वा तस्याः पृष्ठे जुहोति वैश्वानरे हविरिदं जुहो- मीति ॥२२॥ तस्याः पयसि ॥२३॥ स्थालीपाक इत्येके ॥२४॥ ये अग्नय इति पालाश्या दर्व्या मन्थमपमथ्य काम्पीलीभ्यामुपमन्थनीभ्यां तृतीयस्यामस्थीन्यभिजु- होति ॥२५॥ उप द्यां शं ते नीहार इति मन्त्रोक्तान्यव- दाय ॥२६॥ क्षीरोत्सिक्तेन ब्राह्मणस्यावसिञ्चति मधू- अग्नि, पत्थर को स्पर्श करे ॥१६॥ “यवोऽसि०” इत्यादि से गौओं को छूए ॥१७॥ और “खल्वकास्य०” मंत्र से खल्वा और खल कुलों को छूए ॥१८॥ “व्यपाद्या०” से शाम्या की इध्मों का आधान करे ॥१९॥ उनके धूम को भक्षण करे॥२०॥ “यद्यत्क्रव्याद् गृहेत्०” इत्यादि मंत्रों से अग्नि पर स्थाली पाक को पकावे ॥२१॥ और दहन होते समय तक अन्य वत्सा को दूहकर उसके पीठ पर “वैश्वानरे हविरिदं जुहोमि०” से आहुति करे ॥२२॥ उसके दूध में स्थालीपाक पकावे ऐसा कोई २ आचार्य कहते हैं ॥२३॥२४॥ “ये अग्नय०” इत्यादि से पलाश की दर्वी से मन्थ को उपमथन करके काम्पीली की दोनों उपमन्थनी से तीसरी उखा में हड्डियों की आहुति देवे ॥२५॥ “उप द्यां शं ते नीहार०” इत्यादि मंत्र से मंत्रोक्त पदार्थों को लाकर तीसरे या चौथे दिन अस्थि संचय करके “उप द्यां०” इन दो मंत्रों से, “हिरण्यपाणिं०” इन तीन से और “शं ते नीहार०” इस एक ऋ० से मंत्र में कही ओषधियों, जल एवं दूध को एकत्र करके ब्राह्मण की हड्डियों को सिंचन करे ॥ मधु से क्षत्रिय की