भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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२०० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । त्सिक्तेन क्षत्रियस्योदकेन वैश्यस्य ॥२७॥ अव सृजेत्यनु- मन्त्रयते ॥२८॥ मा ते मनो यत्ते अङ्गमिति सञ्चिनोति पच्छः ॥२९॥ प्रथमं शीर्षकपालानि ॥३०॥ पञ्चाह्कलशे समोप्य सर्वसुरभिचूर्णैरवकीर्योत्थापनीभिरुत्थाप्य हरिणीभिर्हरेयुः ॥३१॥ मा त्वा वृक्ष इति वृक्षमूले निदधाति ॥३२॥ स्योनास्मै भवेति भूमौ त्रिरात्रमरसा- शिनः कर्माणि कुर्वते ॥३३॥ दशरात्र इत्येके ॥३४॥ यथा- कुलधर्मं वा ॥३५॥ ऊर्ध्वं तृतीयस्या वैवस्वतं स्थालीपाकं श्रपयित्वा विवस्वान्न इति जुहोति ॥३६॥ युक्ताभ्यां तृतीयाम् ॥३७॥ आनुमतीं चतुर्थीम् ॥३८॥ शेषं शान्त्यु- दकेनोपसिच्याभिमन्त्र्य प्राशयति ॥३९॥ आ प्रच्यवेथा- हड्डियों को और जल से वैश्य की हड्डियों की सींचे। मंत्र में कही गयी ओषधियाँ—शमी की डाल, दूध, शतपत्र, पलाशपत्र, वेतसकर्ण, नदी- फेन, सीसा, सेमार, मुक्तिका एवं सूक्तिका, ॥२६॥२७॥ हड्डियों को “अव सृज०” से अनुमंत्रण करे ॥ कलश में घरे ॥ और पलाश के पत्तों से “मा ते मनो यत्ते अङ्गं०” से पैर से लेकर सब अङ्गों को सींचे। पहिले शिर एवं कपाल आदि को सींचे। उसके अनन्तर ओषधियों के चूर्ण को कलशे में धर कर उसे उठाकर “उत्तिष्ठ प्रच्यवस्व उदन्वती इत एत अग्नीषोमा इदं पूर्वं०” इस मंत्र से कलश को उठाकर “अतिद्रव०” इत्यादि हरिणी ऋचाओं से अभिमंत्रण करके उत्थापक गण उठावें और “मा त्वा वृक्ष०” से वृक्ष के मूल में भूमि को खोद कर कलश को गाड़ देवे। और उस पर मट्टी डालकर भर देवे। उस पर पिण्डदान करे ॥२८॥ ॥२९॥३०॥३१॥३२॥ “स्योनास्मै भव०” से भूमि में तीन रात्रि तक रस सहित भोजन करते हुए कर्मों को करें ॥३३॥ कोई कोई दश रात्रि तक कहते हैं ॥३४॥ किसी का मत है कि कुल में जैसी परिपाटी हो वैसा करें ॥३५॥ तीसरी रात्रि बीतने पर वैवस्वत स्थालीपाक को पका कर “विवस्वान्न०” से आहुतियाँ करे। “युक्ताभ्यां०” से तीसरी रात्रि में आहुति देवे और “आनुमतीं०” से चौथी आहुति करे ॥३६॥३७॥ और शेष को जल से सींच कर अभिमंत्रण करके प्राशन करे ॥३९॥ “आ प्र-