कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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प्रलेप आदि से हलीमक, कामला, पाण्डुरोग नष्ट होते हैं। इसी अथर्व- वेद का यह कौशिक सूत्र—है जिसमें १६ संस्कारों को वर्णन करने के अतिरिक्त-संसार के अत्यन्त प्रयोजनीय विषयों का-उल्लेख और वर्णन है— जिनको संक्षिप्त रूप से आगे दिखलाया गया है ।
कौशिक गृह्यसूत्रम्
कौशिक सूत्र—शौनकीय आदि ४ शाखाओं का संहिता का कल्पसूत्र नामक अङ्ग का एक गृह्यसूत्र है। इस पर पं० दारिल एवं केशव संक्षिप्त टीका मूल और संस्करण श्रीमिस्रर मारीस की ब्लूमफिल्ड साहेब ने अमेरिका से प्रकाशित किया है। अब तक संसार में इसके सिवाय अन्यत्र यह कहीं नहीं प्रकाशित हुआ है। इसका अङ्गरेजी भाषा में किसी २ अंश का अनुवाद ब्लूमफिल्ड साहब कृत Hymns of Atharva veda नामक ग्रंथ में सन्निविष्ट हुआ है। इस सूत्र में अथर्ववेदोक्त मन्त्रोच्चारण के साथ अनेक प्रकारके णीय प्रक्रिया का विस्तृत विवरण है। जैसे— अथर्ववेद के प्रथम काण्ड के दूसरे सूक्त में और दूसरे काण्ड के तृतीय सूक्त में देह से अत्यधिक स्राव । जैसे—उदरामय, आमाशय, इत्यादिकों के निवारण करने के लिये मुञ्जघास ( Sacch arom arrya ) और झरना का जल लेकर दो मंत्रों से प्रयोग लिखा है। कौशिक सूत्र के इन दो मंत्रों के उच्चारण के साथ निम्नलिखित करणीय प्रक्रिया का भी विवरण है। “इन दो मंत्रों के उच्चारण करते समय (जो उच्चारण करते रहें वह) एक पेड़ मुञ्जघास के सूत से रोगी के शरीर में कवच, या,यंत्र ( ताबीज ) की भांति बांध देवे। उसके बाद थोड़ी दीमक की मिट्टी को पीस कर जळ में मिला कर इस जल को रोगी को पान करावे । उसके बाद रोगी को घी लगा देवे और रोगी के गुह्य स्थान में फूक देवे ।” इस प्रकार अनेक मंत्रों के साथ अनेक प्रकार के करणीय प्रक्रिया का विवरण कौशिक सूत्र में है। यह सूत्र लिखित प्रक्रिया आदि अथर्ववेद में भी है। इस विषय में इस समय भी मतभेद
१—Koushik sutra of the Atharveda, with extract from the commentaries of daril and Keshava, edited by Maurice Bloom field, insided as vol XIV of the journal of the American oriental society.