भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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हैं । ※ ( किसी २ के मत में यह है जो, यह प्रक्रिया सब अथर्ववेद के मंत्र रचना समय या उसके परवर्ती काल में परिवर्त्तित हुआ है । इस कौशिकसूत्र में वर्णित प्रक्रियाओं के भैषज्यविज्ञान और चिकित्सा में अधिकतर ज्ञान दृष्ट होने से स्वतः ही मन में होता है, जो ये प्रक्रियायें अथर्ववेद के समय रहने पर भी परवर्ती काल में बदल गयी थी । प्रक्रियाओं को बदलने के सम्बन्ध में मतभेद होने पर भी कौशिक सूत्र अथर्ववेद के पीछे और आयुर्वेद ग्रन्थों के पहिले रचित हुआ था—ऐसा मानना ही पड़ेगा । अथर्ववेद के “भैषज्यानि” और “आयुष्याणि” समुदायमन्त्र । इन सब मंत्रों में अथर्ववेद के समय हिन्दुओं को आयुर्वेद के ज्ञान का परिचय पाया जाता है। कौन २ मंत्र किस २ रोग को सम्बोधन करके रचित और मंत्र रोगों के प्रतिषेधक भेषज और धातु को सम्बो- धन कर उच्चरित हुए । जो सब मंत्र रोगों के प्रति सम्बोधित हैं, उनमें विशेष २ लक्षण वर्णित हैं। दृष्टान्त स्वरूप जैसे—“तक्षण” वा “ज्वर”। इस लक्षण के अनेकों सूक्तों में वर्णित हैं—प्रथम काण्ड, २५ सूक्त, पञ्चम काण्ड, ४ सूक्त, २२ सूक्त ; छठा काण्ड, ३ सूक्त, २० सू०, ९५ सू०, १०२ सू०, ११६ सू०, इन सूक्तों में ज्वरों के अनेक लक्षण वर्णित हुए हैं। और उनका औषध स्वरूप “कुष्ठ” नामक भेषज को ( costus speciosus or Arabicus ) आह्वान किया गया है ( ५ का० सू० ४ ) जो सब मंत्र किसी भेषज को सम्बोधित कर सब भेषज या उसका रस सेवन का


*—The practices mere ( in the Koushika Sutras ) invelve a mare extentive medcen etc and to mare elaborate theropenties, but it is difficult to define in detail the extent to which practices similar to those of the sutras must be presupposed from the start with the charms of the Atherva Veda—Bloom field’s the Atherva Veda. page 68. The value of the sutra is primarily as a help to the under- standing of the ritual and general purposes of a given hymn and so mediatedly its exegeses. Whitney—“Hymns of the Athervaveda.” General Introduction p. 1. XXV.