कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २०५ समांसः पिण्डपितृयज्ञः ॥१२॥ उत्थापनीभिरुत्थाप्य हरि- णीभिर्हरेयुः ॥१३॥ अथावसायेति पश्चात् पूर्वकृतेभ्यः पूर्वाणि पूर्वेभ्योऽपराणि यवीयसाम् ॥१४॥ प्राग्दक्षिणां दिशमभ्युत्तराम्परां दिशमभितिष्ठन्ति ॥१५॥ यथा चिँतिं तथा श्मशानं दक्षिणापरां दिशमभिप्रवणम् ॥ ॥१६॥५॥८४॥ अथ मानानि ॥१॥ दिष्टिकुदिष्टिवितस्तिनिमुष्ट्य- रत्निपदप्रक्रमाः ॥२॥ प्रादेशेन धनुषा चेमां मात्रां मिमी- मह इति ॥३॥ सप्त दक्षिणतो मिमीते सप्तोत्तरतः पञ्च पुरस्तात् त्रीणि पश्चात् ॥४॥ नव दक्षिणतो मिमीते 'नवोत्तरतः सप्त पुरस्तात्पञ्च पश्चात् ॥५॥ एकादश दक्षि- णतो मिमीत एकादशोत्तरतो नव पुरस्तात्सप्त पश्चात् ॥६॥ एकादशभिर्देवदाशनाम् ॥७॥ अयुग्ममानानि परि- ॥११॥ विवाह के पहिले समांस पिण्डपितृयज्ञ करे ॥१२॥ उत्थापनी ऋ० से उठावें और हरिणी से लावें ॥१३॥ यह कर्म अमावास्या के प्रातःकाल करे ॥ अर्थात् उन हड्डियों को मण्डप से उठा कर लावें और पाद पर धरें ॥ उसकी विधि यह है कि पीछे पूर्वकृत पितरों के लिये ॥ “अवसाय०” से पश्चात् पहिले किये हुओं के लिये, और अपरों को युवाओं के लिये ॥१४॥ पूर्व दक्षिण दिशा के सम्मुख उत्तर दिशा और पश्चिम दिशा के सम्मुख रहें ॥१५॥ जैसे चिति को उसी प्रकार श्मशान को दक्षिण पश्चिम ढालुआ बनावे ॥१६॥५॥८४॥ यह चौरासीवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब मान ( माप, नाप ) के विषय में कहते हैं ॥१॥ दिष्टि, कुदिष्टि, वितस्ति, निमुष्टि, अरत्नि, पद, प्रक्रम होते हैं ॥२॥ प्रादेश और धनुष से “इमां मात्रां मिमीमह०” से मण्डप बनाने के लिये भूमि को नाप करे ॥३॥ सात दक्षिण से, सात उत्तर से, ५ पूर्व से और तीन पश्चिम से नाप करे ॥४॥ नौ दक्षिण से, नौ उत्तर से, सात पूर्व और पांच पश्चिम से नापे ॥५॥ ग्यारह दक्षिण से, ग्यारह उत्तर से, नौ पूर्व से, पांच पश्चिम से नाप करे ॥६॥ ग्यारह का नाप देवदर्शियों के लिये ॥७॥ विषम