कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ॥३३॥ कुरुतेत्याह ॥३४॥ तस्या दक्षिणमर्धं ब्राह्मणान् भोजयति सव्यं पितॄन् ॥३५॥४॥८३॥ वह वपां जातवेदः पितृभ्यो यत्रैतान् वेत्थ निहि- तान्पराके । मेदसः कुल्या उप तान् स्रवन्तु सत्या एषा- माशिषः सन्तु कामाः स्वाहा स्वधेति वपायास्त्रिर्जुहोति ॥१॥ इमं यमेति यमाय चतुर्थीम् ॥२॥ एकविंशत्या यवैः कृशरं रन्धयति युतमन्यत्प्रपाकं च ॥ ३॥ सथवस्थ जीवाः प्राश्नन्ति ॥४॥ अथेतरस्य पिण्डं निपृणाति ॥५॥ यं ते मन्थमिति मन्त्रोक्तं विमिते निपृणाति ॥६॥ तदु- द्धतोष्महर्तारो दासा भुञ्जते ॥ ७ ॥ वीणा वदन्त्वित्याह ॥८॥ महयत पितॄनिति रिक्तकुम्भं विमितमध्ये निधाय तं जरदुपानहाघ्नन्ति ॥९॥ कस्ये मृंजाना इति त्रिः प्रसव्यं प्रकीर्णकेश्यः परियन्ति दक्षिणानूरूनाघ्नानाः ॥१०॥ एवं मध्यरात्रेऽपररात्रे च ॥११॥ पुरा विवाहात् दिखलावे और ब्राह्मण कहे कि “करो” ॥३४॥ उस गौ का दहिना अर्द्ध भाग को ब्राह्मणों को खिलावे और वाम भाग को पितरों के निमित्त ॥३५॥४॥८३॥ यह तिरासीवी कण्डिका खतम हुई ॥ “वह वपां जातवेदः०” इत्यादि से वपा की तीन आहुतियाँ देवे ॥१॥ “इमं यमाय०” से चौथी आहुति देवे ॥२॥ इक्कीस यवों की खिचड़ी बनावे और दूसरे पाक को बनावे ॥३॥ यव की खिचड़ी को गोत्र वाले (सगो- त्रीगण) लोग भोजन करें ॥४॥ और दूसरे प्रपाक का पिण्ड बनावे ॥५॥ “यं ते मन्थं०” से मन्त्रोक्त रीति से पिण्ड को विमित (पात्र) में धरे ॥ काम करने वाले दास भोजन करें ॥ प्रैष द्वारा “वीणां वदन्तु” ऐसा कहें तब बाजा बजावें “महयत पितॄन्०” से खाली घड़े को विमित में धर कर उसको पुराने जूते से मारें ॥६॥ “कस्येमृजाना०” से वाम ओर से शिर केशों को खोल कर दहिने जांघ को पीटती हुई तीन बार परिक्रमा करें ॥१०॥ इसी प्रकार आधीरात और आधीरात के पीछे करें