भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

पृष्ठ 235, कुल 361 में से

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॥२१॥ अपि वोदकान्ते वसनमास्तीर्यासाविति ह्वयेत् ॥२२॥ तत्र यो जन्तुर्निपतेत्समुत्थापनीभिरुत्थाप्य हरि- णीभिर्हरेयुः ॥२३॥ अपि वा त्रीणि षष्टिशतानि पला- शत्सरूणाम् ॥२४॥ ग्रामे दक्षिणोदग्द्वारं विमितं दर्भै- रास्तारयति ॥२५॥ उत्तरं जीवसंचरो दक्षिणं पितृसंचरः ॥२६॥ अनस्तमित आ यातेत्यायापयति ॥२७॥ आच्या जान्वित्युपवेशयति ॥२८॥ सं विशन्त्विति संवेशयति ॥२९॥ एतद्वः पितरः पात्रमिति त्रीण्युदकंसांश्चिनयति ॥३०॥ त्रीन् स्नातानुलिप्तान् ब्राह्मणान् मधुमन्थं पाययति ॥३१॥ ब्राह्मणो मधुपर्कमाहारयति ॥३२॥ गां वेदयन्ते

कर हरिणी ऋचा से लावें ॥१६॥१७॥१८॥१९॥२०॥ अस्थि के नाश हो जाने पर प्रायश्चित्त कर्म को कहते हैं । अस्थि यदि नष्ट हो जावें, उस स्थान से मट्टी ( पांसु-धूली ) लेकर अस्थि गृह में डाल कर वहाँ से उठावे ॥२१॥ या जलाशय के पास वस्त्र को बिछाकर “असौ०” ऐसा कहे ॥२२॥ वहाँ यदि कोई जन्तु गिर पड़े तो उसको उत्थापनी ऋचाओं से उठाकर हरिणी ऋ० से लावें ॥ या ३६० पलाशकी त्सरु के प्रान्त भागों से पुरुष बनाकर वहाँ से उत्थापनी ऋ० से उठाकर हरिणी ऋ० से लावें ॥ शरीर के नाश होने पर भी या दग्ध हो जाने पर भी यही प्रायश्चित्त होता है ॥२३॥२४॥ ग्राम में जो मण्डप बना है उसके द्वार एक दक्षिण मुख एवं दूसरा उत्तर मुख बनावे और उसमें डाभों को बिछावे ॥२५॥ उत्तर द्वार अन्य जीवों का आने जाने का होगा एवं दक्षिण द्वार पितरों के लिये जानो ॥२६॥ सूर्य रहते समय “आयात” इत्यादि ऋचा पढ़कर अस्थियों को मण्डप में लावे ॥ और “आच्या जानु०” इत्यादि से उसको धरे ॥२७॥२८॥ संविशन्तु०” से उसको संवेशन करे ॥२९॥ “एतद्वः पितरः पात्रं०” से तीन जलपात्र लावे ॥३०॥ और तीन नहाये पूजादि करके निवृत्त हुए ब्राह्मणों को मधुमन्थ को पिलावे ॥३१॥ ब्राह्मण के लिये मधुपर्क लावे ॥३२॥ गौ को लाकर

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