कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ध्यान्निदह्यतामघमिति ॥७॥ अमावास्यायां निदध्यादमा हि पितरो भवन्ति ॥८॥ अथावसानम् ॥९॥ तद्यत्समं समूलमविदग्धं प्रतिष्ठितं प्रागुदक्प्रवणम् ॥१०॥ यत्रा- कण्टका वृक्षाश्चौषधयश्च ॥११॥ उन्नतं स्वर्गकामश्च ॥१२॥ श्वोऽमावास्येति गां कारयते ॥१३॥ तस्याः सव्यं चाप- घनं प्रपाकं च निधाय ॥१४॥ भिक्षां कारयति ॥१५॥ ग्रामे यामसारस्वतान् होमान् दत्त्वा॥१६॥ सम्प्रोक्षणीभ्यां काम्पीलशाखया निवेशनमनुचर्य ॥१७॥ प्राग्दक्षिणं शाखां प्रविध्य सीरेण कर्षयित्वा शाखाभिः परिवार्य ॥१८॥ पुनर्देहीति वृक्षमूलादादत्ते ॥१९॥ यत्ते कृष्ण इति भूमेर्वसने समोप्य सर्वसुरभिचूर्णैरवकीर्योत्थापनीभि- रुत्थाप्य हरिणीभिर्हरेयुः ॥२०॥ अविदन्तो देशात्पांसून् पितरों का निधान करने से पाप की शान्ति होती है ॥६॥ निदाघ ऋतु में निधान करने से पाप भस्म हो जाता है ॥७॥ अमावास्या तिथि में निधान करने से पितृगण अमा (साथ) होते हैं ॥८॥ अब अवसान (जहां मृत मनुष्य का अस्थि संचय कलश रहता है—उस स्थान को कहते हैं ।) के विषय में कहते हैं ॥९॥ जो स्थान समचौरस समूल- जहां मुर्दा न जला हो—और पूर्व या उत्तर को ढालुआ हो ।। जहाँ कांटे, वृक्ष, ओषधियां न हों ॥१०।११॥ स्वर्ग की इच्छा वाला उन्नत (ऊँची) भूमि को अवसान बनावे ॥१२॥ कल्ह प्रातःकाल अमावास्या तिथि होगी—पितृयज्ञ होगा—अतएव आज गौ का प्रबन्ध करवा रक्खे ॥१३॥ उसके वाम चापघन और प्रपाक को लाकर धरे और भिक्षा करवावे ॥१४।१५॥ और ग्राम में याम एवं सारस्वत होमों की आहुतियां देकर संप्रोक्षणी ऋ० से काम्पील शाखा द्वारा निवेशन (घर) बनाकर पूर्व पश्चिम भाग में शाखा को गाड़कर उस भूमि को हल से जुतवा कर शाखाओं से घेरा बनाकर “पुनर्देहि” से वृक्ष के मूल में से अस्थि- कलश को लाकर भूमि में वस्त्र बिछाकर उस पर धरे । और सर्वसुरभि के चूर्णों को उस पर बखेर कर उत्थापनी ऋचा को पढ़कर उसे उठा