कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
२०२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ध्यान्निदह्यतामघमिति ॥७॥ अमावास्यायां निदध्यादमा हि पितरो भवन्ति ॥८॥ अथावसानम् ॥९॥ तद्यत्समं समूलमविदग्धं प्रतिष्ठितं प्रागुदक्प्रवणम् ॥१०॥ यत्रा- कण्टका वृक्षाश्चौषधयश्च ॥११॥ उन्नतं स्वर्गकामश्च ॥१२॥ श्वोऽमावास्येति गां कारयते ॥१३॥ तस्याः सव्यं चाप- घनं प्रपाकं च निधाय ॥१४॥ भिक्षां कारयति ॥१५॥ ग्रामे यामसारस्वतान् होमान् दत्त्वा॥१६॥ सम्प्रोक्षणीभ्यां काम्पीलशाखया निवेशनमनुचर्य ॥१७॥ प्राग्दक्षिणं शाखां प्रविध्य सीरेण कर्षयित्वा शाखाभिः परिवार्य ॥१८॥ पुनर्देहीति वृक्षमूलादादत्ते ॥१९॥ यत्ते कृष्ण इति भूमेर्वसने समोप्य सर्वसुरभिचूर्णैरवकीर्योत्थापनीभि- रुत्थाप्य हरिणीभिर्हरेयुः ॥२०॥ अविदन्तो देशात्पांसून् पितरों का निधान करने से पाप की शान्ति होती है ॥६॥ निदाघ ऋतु में निधान करने से पाप भस्म हो जाता है ॥७॥ अमावास्या तिथि में निधान करने से पितृगण अमा (साथ) होते हैं ॥८॥ अब अवसान (जहां मृत मनुष्य का अस्थि संचय कलश रहता है—उस स्थान को कहते हैं ।) के विषय में कहते हैं ॥९॥ जो स्थान समचौरस समूल- जहां मुर्दा न जला हो—और पूर्व या उत्तर को ढालुआ हो ।। जहाँ कांटे, वृक्ष, ओषधियां न हों ॥१०।११॥ स्वर्ग की इच्छा वाला उन्नत (ऊँची) भूमि को अवसान बनावे ॥१२॥ कल्ह प्रातःकाल अमावास्या तिथि होगी—पितृयज्ञ होगा—अतएव आज गौ का प्रबन्ध करवा रक्खे ॥१३॥ उसके वाम चापघन और प्रपाक को लाकर धरे और भिक्षा करवावे ॥१४।१५॥ और ग्राम में याम एवं सारस्वत होमों की आहुतियां देकर संप्रोक्षणी ऋ० से काम्पील शाखा द्वारा निवेशन (घर) बनाकर पूर्व पश्चिम भाग में शाखा को गाड़कर उस भूमि को हल से जुतवा कर शाखाओं से घेरा बनाकर “पुनर्देहि” से वृक्ष के मूल में से अस्थि- कलश को लाकर भूमि में वस्त्र बिछाकर उस पर धरे । और सर्वसुरभि के चूर्णों को उस पर बखेर कर उत्थापनी ऋचा को पढ़कर उसे उठा
॥२१॥ अपि वोदकान्ते वसनमास्तीर्यासाविति ह्वयेत् ॥२२॥ तत्र यो जन्तुर्निपतेत्समुत्थापनीभिरुत्थाप्य हरि- णीभिर्हरेयुः ॥२३॥ अपि वा त्रीणि षष्टिशतानि पला- शत्सरूणाम् ॥२४॥ ग्रामे दक्षिणोदग्द्वारं विमितं दर्भै- रास्तारयति ॥२५॥ उत्तरं जीवसंचरो दक्षिणं पितृसंचरः ॥२६॥ अनस्तमित आ यातेत्यायापयति ॥२७॥ आच्या जान्वित्युपवेशयति ॥२८॥ सं विशन्त्विति संवेशयति ॥२९॥ एतद्वः पितरः पात्रमिति त्रीण्युदकंसांश्चिनयति ॥३०॥ त्रीन् स्नातानुलिप्तान् ब्राह्मणान् मधुमन्थं पाययति ॥३१॥ ब्राह्मणो मधुपर्कमाहारयति ॥३२॥ गां वेदयन्ते
कर हरिणी ऋचा से लावें ॥१६॥१७॥१८॥१९॥२०॥ अस्थि के नाश हो जाने पर प्रायश्चित्त कर्म को कहते हैं । अस्थि यदि नष्ट हो जावें, उस स्थान से मट्टी ( पांसु-धूली ) लेकर अस्थि गृह में डाल कर वहाँ से उठावे ॥२१॥ या जलाशय के पास वस्त्र को बिछाकर “असौ०” ऐसा कहे ॥२२॥ वहाँ यदि कोई जन्तु गिर पड़े तो उसको उत्थापनी ऋचाओं से उठाकर हरिणी ऋ० से लावें ॥ या ३६० पलाशकी त्सरु के प्रान्त भागों से पुरुष बनाकर वहाँ से उत्थापनी ऋ० से उठाकर हरिणी ऋ० से लावें ॥ शरीर के नाश होने पर भी या दग्ध हो जाने पर भी यही प्रायश्चित्त होता है ॥२३॥२४॥ ग्राम में जो मण्डप बना है उसके द्वार एक दक्षिण मुख एवं दूसरा उत्तर मुख बनावे और उसमें डाभों को बिछावे ॥२५॥ उत्तर द्वार अन्य जीवों का आने जाने का होगा एवं दक्षिण द्वार पितरों के लिये जानो ॥२६॥ सूर्य रहते समय “आयात” इत्यादि ऋचा पढ़कर अस्थियों को मण्डप में लावे ॥ और “आच्या जानु०” इत्यादि से उसको धरे ॥२७॥२८॥ संविशन्तु०” से उसको संवेशन करे ॥२९॥ “एतद्वः पितरः पात्रं०” से तीन जलपात्र लावे ॥३०॥ और तीन नहाये पूजादि करके निवृत्त हुए ब्राह्मणों को मधुमन्थ को पिलावे ॥३१॥ ब्राह्मण के लिये मधुपर्क लावे ॥३२॥ गौ को लाकर
२०४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ॥३३॥ कुरुतेत्याह ॥३४॥ तस्या दक्षिणमर्धं ब्राह्मणान् भोजयति सव्यं पितॄन् ॥३५॥४॥८३॥ वह वपां जातवेदः पितृभ्यो यत्रैतान् वेत्थ निहि- तान्पराके । मेदसः कुल्या उप तान् स्रवन्तु सत्या एषा- माशिषः सन्तु कामाः स्वाहा स्वधेति वपायास्त्रिर्जुहोति ॥१॥ इमं यमेति यमाय चतुर्थीम् ॥२॥ एकविंशत्या यवैः कृशरं रन्धयति युतमन्यत्प्रपाकं च ॥ ३॥ सथवस्थ जीवाः प्राश्नन्ति ॥४॥ अथेतरस्य पिण्डं निपृणाति ॥५॥ यं ते मन्थमिति मन्त्रोक्तं विमिते निपृणाति ॥६॥ तदु- द्धतोष्महर्तारो दासा भुञ्जते ॥ ७ ॥ वीणा वदन्त्वित्याह ॥८॥ महयत पितॄनिति रिक्तकुम्भं विमितमध्ये निधाय तं जरदुपानहाघ्नन्ति ॥९॥ कस्ये मृंजाना इति त्रिः प्रसव्यं प्रकीर्णकेश्यः परियन्ति दक्षिणानूरूनाघ्नानाः ॥१०॥ एवं मध्यरात्रेऽपररात्रे च ॥११॥ पुरा विवाहात् दिखलावे और ब्राह्मण कहे कि “करो” ॥३४॥ उस गौ का दहिना अर्द्ध भाग को ब्राह्मणों को खिलावे और वाम भाग को पितरों के निमित्त ॥३५॥४॥८३॥ यह तिरासीवी कण्डिका खतम हुई ॥ “वह वपां जातवेदः०” इत्यादि से वपा की तीन आहुतियाँ देवे ॥१॥ “इमं यमाय०” से चौथी आहुति देवे ॥२॥ इक्कीस यवों की खिचड़ी बनावे और दूसरे पाक को बनावे ॥३॥ यव की खिचड़ी को गोत्र वाले (सगो- त्रीगण) लोग भोजन करें ॥४॥ और दूसरे प्रपाक का पिण्ड बनावे ॥५॥ “यं ते मन्थं०” से मन्त्रोक्त रीति से पिण्ड को विमित (पात्र) में धरे ॥ काम करने वाले दास भोजन करें ॥ प्रैष द्वारा “वीणां वदन्तु” ऐसा कहें तब बाजा बजावें “महयत पितॄन्०” से खाली घड़े को विमित में धर कर उसको पुराने जूते से मारें ॥६॥ “कस्येमृजाना०” से वाम ओर से शिर केशों को खोल कर दहिने जांघ को पीटती हुई तीन बार परिक्रमा करें ॥१०॥ इसी प्रकार आधीरात और आधीरात के पीछे करें
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २०५ समांसः पिण्डपितृयज्ञः ॥१२॥ उत्थापनीभिरुत्थाप्य हरि- णीभिर्हरेयुः ॥१३॥ अथावसायेति पश्चात् पूर्वकृतेभ्यः पूर्वाणि पूर्वेभ्योऽपराणि यवीयसाम् ॥१४॥ प्राग्दक्षिणां दिशमभ्युत्तराम्परां दिशमभितिष्ठन्ति ॥१५॥ यथा चिँतिं तथा श्मशानं दक्षिणापरां दिशमभिप्रवणम् ॥ ॥१६॥५॥८४॥ अथ मानानि ॥१॥ दिष्टिकुदिष्टिवितस्तिनिमुष्ट्य- रत्निपदप्रक्रमाः ॥२॥ प्रादेशेन धनुषा चेमां मात्रां मिमी- मह इति ॥३॥ सप्त दक्षिणतो मिमीते सप्तोत्तरतः पञ्च पुरस्तात् त्रीणि पश्चात् ॥४॥ नव दक्षिणतो मिमीते 'नवोत्तरतः सप्त पुरस्तात्पञ्च पश्चात् ॥५॥ एकादश दक्षि- णतो मिमीत एकादशोत्तरतो नव पुरस्तात्सप्त पश्चात् ॥६॥ एकादशभिर्देवदाशनाम् ॥७॥ अयुग्ममानानि परि- ॥११॥ विवाह के पहिले समांस पिण्डपितृयज्ञ करे ॥१२॥ उत्थापनी ऋ० से उठावें और हरिणी से लावें ॥१३॥ यह कर्म अमावास्या के प्रातःकाल करे ॥ अर्थात् उन हड्डियों को मण्डप से उठा कर लावें और पाद पर धरें ॥ उसकी विधि यह है कि पीछे पूर्वकृत पितरों के लिये ॥ “अवसाय०” से पश्चात् पहिले किये हुओं के लिये, और अपरों को युवाओं के लिये ॥१४॥ पूर्व दक्षिण दिशा के सम्मुख उत्तर दिशा और पश्चिम दिशा के सम्मुख रहें ॥१५॥ जैसे चिति को उसी प्रकार श्मशान को दक्षिण पश्चिम ढालुआ बनावे ॥१६॥५॥८४॥ यह चौरासीवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब मान ( माप, नाप ) के विषय में कहते हैं ॥१॥ दिष्टि, कुदिष्टि, वितस्ति, निमुष्टि, अरत्नि, पद, प्रक्रम होते हैं ॥२॥ प्रादेश और धनुष से “इमां मात्रां मिमीमह०” से मण्डप बनाने के लिये भूमि को नाप करे ॥३॥ सात दक्षिण से, सात उत्तर से, ५ पूर्व से और तीन पश्चिम से नाप करे ॥४॥ नौ दक्षिण से, नौ उत्तर से, सात पूर्व और पांच पश्चिम से नापे ॥५॥ ग्यारह दक्षिण से, ग्यारह उत्तर से, नौ पूर्व से, पांच पश्चिम से नाप करे ॥६॥ ग्यारह का नाप देवदर्शियों के लिये ॥७॥ विषम
२०६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । मण्डलानि चतुरस्राणि वा शौनकिनाम् ॥८॥ तथाहि दृश्य- न्ते ॥६॥ यावान् पुरुष ऊर्ध्वबाहुस्तावानग्निश्चितः ॥१०॥ सव्यानि दक्षिणाद्वाराण्ययुग्मशिलान्ययुग्मेष्टकानि च ॥११॥ इमां मात्रां मिमीमह इति दक्षिणतः सव्य- रज्जुं मीत्वा ॥१२॥ वारयतामघमिति वारणं परिधिं परिदधाति शङ्कुं च निचृतति ॥१३॥ पुरस्तान्मीत्वा शमेभ्योऽस्त्वघमिति शामीलं परिधिं परिदधाति शङ्कुं च निचृतति ॥१४॥ उत्तरतो मीत्वा शाम्यत्वघमित्यौ- दुम्बरं परिधिं परिदधाति शङ्कुं च निचृतति ॥१५॥ पश्चा- न्मीत्वा शान्तमघमिति पालाशं परिधिं परिदधाति शङ्कुं च निचृतति ॥१६॥ अमासीत्यनुमन्त्रयते ॥१७॥ अक्ष्णया लोहितसूत्रेण निबध्य ॥१८॥ स्तुहि श्रुतमिति मध्ये गर्तं खात्वा पाशिसिकतोषोदुम्बरशङ्कशालूक-
( बे जोड संख्या ) मान परिमण्डलों के लिये या चतुष्कोण समचौरस श्मशान भूमि को बनावे यह विकल्प पक्ष शौनक शाखा वालों का है ॥८॥ लोक में ऐसा ही देखा जाता है ॥९॥ जितना ऊँचा पुरुष बाहु उठाने पर होता है, उसी परिमाण का अग्निचित् होता है ॥१०॥ दक्षिण के दरवाजे सव्य होवें, विषम संख्यक शिलायें या इष्टिका ( ईंटें ) ये होवें ॥११॥ “इमां मात्रां मिमीमह०” से दक्षिण से सव्य रज्जु को नाप करके “वारयतामघं०” से वारण परिधि को घरे और शङ्कु को गाड़े ॥१२॥१३॥ पूर्व से नाप करके “शमेभ्योऽस्त्वघं०” इत्यादि से शामील- परिधि को घरे और शङ्कु को गाड़े ॥१४॥ उत्तर से नाप कर “शाम्यत्वघं०” से गूलर की परिधि को घर कर शङ्कु को गाड़े ॥१५॥ पश्चिम भाग को नाप करके “शान्तमघं०” से पलाश की परिधि को धरकर शङ्कु को गाड़े ॥१६॥ “अमासि०” से अनुमंत्रण करे ॥१७॥ अक्ष्णा द्वारा लाल सूत से बान्ध देवे ॥१८॥ “स्तुहि श्रुतं०” से बीच में गर्त खोदकर पाशि, बालु- का, उषा, गूलर, शङ्क, शालूक, सर्व सुरभि, शमी इनके चूर्णों को उस
सर्षसुरभिशमीचूर्णानि निवपति ॥१९॥ निःशीयतामघ- मिति निःशीयमानमास्तृणाति ॥२०॥ असंप्रत्यघम् ॥२१॥ विलुम्पतामघमिति परिचैलं दूर्शं विलुम्पति ॥२२॥ उक्तो होमो दक्षिणतः स्तरणं च ॥२३॥ एतदा रोह ददा- मीति कनिष्ठो निवपति ॥२४॥ एदं बर्हिरिति स्थित- सूनुर्यथापरु सञ्चिनोति ॥२५॥ मा ते मनो यत्ते अङ्ग- मिन्द्रो मोदपूरित्यातोऽनुमन्त्रयते ॥२६॥ धानाः सलिङ्गा- भिरावपति ॥२७॥६॥८५॥ इदं कसाम्ब्विति सजातानवेक्षयति ॥१॥ ये च जीवा ये ते पूर्वे परागता इति सर्पिर्मधुभ्यां चरुं पूरयित्वा शीर्ष- देशे निदधाति ॥२॥ अपूपवानिति मन्त्रोक्तं दिक्ष्वष्टम- देशेषु निदधाति ॥३॥ मध्ये पचन्तम् ॥४॥ सहस्रधारं गर्त्त में डाले ॥ १६॥ “निःशीयतामघं०” फटे पुराने कपड़े को बिछावे ॥२०॥ “असंप्रत्यघं०” और “विलुम्पतामघं०” से दूसरा परिचैल वस्त्र को बिछावे ॥२१॥२२॥ दक्षिण से होम करना एवं स्तरण करना कहा गया ॥२३॥ उसी स्थान में बाहर धरने से अग्नि कर्म होगा अतएव वस्त्र से होम और स्तरण दोनों कह गये ॥२३॥ “एतदारोह ददामि०” से सब से छोटा-( नाते में ) सब हड्डियों को उसी गर्त्त में डाले ॥२४॥ “एदं बर्हिः०” से कुल में जो ज्येष्ठ हो वह हड्डियों को गर्त्त में डाले ॥२५॥ “मा ते मनो यत्ते०” से अनुमंत्रण करे ॥२६॥ “या ते धाना” ये दो “धानाधेनुः०” एक ऋचा “एवास्ते असौ धेनव०” यह एक ऋ० “यास्ते धान्य अस्तु०” यह एक ऋचा इन ऋचाओं से तिल मिश्र धान को अस्थियों पर डाले ॥२७॥६॥८५॥ यह पचासीवी कण्डिका समाप्त हुई ॥ “इदं कसाम्बु०” से सजाति के लोगों को दिखलावे ॥१॥ “ये च जीवा ये ते०” इत्यादि से घृत और मधु से दो चरु को भरकर शीर्ष देश में धरे और आठ चरुओं को अपूपों से भरकर अलग २ आठ दिशाओं में धरे “अपूपवान्०” से धरे । बीच में पकते हुए चरु को धरे ॥२॥३॥४॥ “सहस्रधारं शतधारं०” से जल से सींचकर 'पर्जो
शतधारमित्यद्भिरभिविष्यन्द्य ॥५॥ पर्णो राजेति मध्यम- पलाशैरभिनिदधाति ॥६॥ ऊर्जो भाग इत्यश्मभिः ॥७॥ उत्त स्तभ्नामीति लोगान्यथापरु ॥८॥ निःशीयता- मघमिति निःशीयमानेनावच्छाद्य दर्भैरवस्तीर्य ॥६॥ इद्मिद्धा उ नोप सर्पासौ हा इति चिन्वन्ति ॥१०॥ यथा यमायेति संश्रित्य ॥११॥ शृणात्वघमित्युपरिशिरः स्तम्ब- मादधाति ॥१२॥ प्रतिषिद्धमेकेषाम् ॥१३॥ अकल्माषाणां काण्डानामष्टाङ्गुलीं तेजनीमन्तर्हितमघमिति ग्रामदेशा- दुच्छ्रयति ॥१४॥ प्रसव्यं परिषिच्य कुम्भान् भिन्द- न्ति ॥१५॥ समेतेत्यपरस्यां श्मशानस्रक्त्यां ध्रुवनान्यु- पयच्छन्ते ॥१६॥ पश्चादुत्तरतोऽग्नेर्वर्चसा मां विवस्वा-
राजा०” से मध्यम पलाशों द्वारा उसको ढाक देवे ॥५।६॥ “ऊर्जो भाग०” से पत्थरों से या विषम इष्टिकाओं से वामावर्त्त श्मशान को घेरेदार कर चुन देवे और लोक भी बड़े छोटे क्रम से यथास्थान बैठे ॥७।८॥ ‘निःशीयतामघं०” से फटे कपड़े से ढाक कर उसपर कुशों को बिछावे ॥९॥ “इद्मिद्धा०” से ईंटादि से भलीभाँति चुन देवे ॥१०॥ “यथा यमाय०” से, एक ईंटों के साथ दूसरी ईंटों को सटाकर लगावे ॥११॥ “शृणात्वघं०” से ऊपर शिर के स्तम्ब को धरे ॥१२॥ किन्हीं आचार्य्य के मत में ऐसा करना निषिद्ध है ॥१३॥ अकल्माषों के काण्डों की आठ अङ्गुली की तेजनी को “अन्तर्हितमघं०” से अभि- मंत्रण करके ग्राम और श्मशान को छिपा देने के लिये खड़ी कर देवे ॥१४॥ आठ अङ्गुल की कटिका को कुश से प्रसव्य तीन बार जल सींच करके घुमाकर सींचे और पश्चिम दिशा में उसे फोड़ देवे ॥१५॥ “समेत विश्व०” इस ऋचा से सब ही बन्धुगण जल से सेचन करे और ध्रुवनों को देवे । और केशों को खोलकर स्त्रियाँ वाम भाग से तीन बार परि- क्रमा करती हुई और अपनी दाहिनी जंघाओं को पीटती हुई फेरे लगावें ॥१६॥ यह ध्रुवन कर्म है ॥ अग्नि के पश्चात् भाग में स्थित हो कर्त्ता एवं गोत्रिगण “अग्नेर्वर्चसा मां०” इत्यादि ५ ऋचाओं से उप-
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २०९ निन्द ऋतुमिस्यातः ॥१७॥ समिन्धत इति पश्चात्संकसु- कमुद्दीपयति ॥१८॥ अस्मिन्वयं यदिप्रं सीसे मृद्बहमित्य- भ्यवनेजयति ॥१९॥ कृष्णोर्णया पाणिपादान्निमृज्य ॥२०॥ इमे जीवा उदीचीनैरिति मन्त्रोक्तम् ॥२१॥ त्रिःसप्तेति कूड्या पदानि योपयित्वा श्मशानात् ॥२२॥ मृत्योः पदमिति द्वितीयया नावः॥२३॥ परं मृत्यो इति प्राग्दक्षिणं कूदीं प्रवि- ध्य ॥ २४ ॥ सप्त नदीरूपाणि कारयित्वोदकेन पूरयित्वा ॥२५॥ आरोहत सवितुर्नावमेतां सुत्रामाणं महीम् ष्विति सहिरण्यां सयवां नावमारोहयति ॥ २६ ॥ अश्मन्वती- रीयत उत्तिष्ठता प्रतरता सखाय इत्युदीचस्तारयति ॥ २७ ॥ शर्कराया समिदाधानात् ॥ २८ ॥ वैवस्वतादि समानम् ॥ २९ ॥ प्राप्य गृहान्समानः पिण्डपितृयज्ञः ॥३०॥[८६॥ अथ पिण्डपितृयज्ञः ॥१॥ अमावास्यायां सायं न्यन्हे- स्थान करे ॥१७॥ "समिन्धत०" से पश्चात् संकसुंक को जला देवे ॥१८॥ "अस्मिन्वयं यदिप्रं०" से अवनेजन करे ॥१९॥ काले सूत से हाथ पैर को मार्जन करके "इमे जीवा०" से गोत्र के लोग "त्रिः सप्त०" से कूदी से पैर को छिपाकर श्मशानभूमि से नदियों की ओर नावे ॥२०॥२१॥२२॥ "मृत्योः पदं०" इस दूसरी ऋचा से नाव को लावे । "परं मृत्योः” से प्रदक्षिणा कर कूदी को छेदे । और सात नदियों के समान बनवा कर उनमें जल भरवा देवे । और "आरोहत०" इत्यादि मंत्र पढ़कर सोने एवं जौ के साथ नाव पर सवार करवावे ॥२३॥२४॥२५॥२६॥ "अश्म- न्वती०" इत्यादि से उत्तर दिशा में उतरवा देवे ॥२७॥ शर्करादि, समि- दाधान से लेकर यमव्रत तक सारे कर्म पूर्ववत् यहाँ भी होंगे ॥२८॥२९॥ ३०॥७।८६॥ यह छियासीवी कण्डिका समाप्त हुई ॥ अब पिण्ड पितृयज्ञ के विषय में कहेंगे ॥१॥ इस यज्ञ के करने का समय अमावास्या को सायंकाल और अपराह्न में है ऐसा ब्राह्मण ग्रन्थ २७
२१० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ऽहनि विज्ञायते ॥२॥ मित्रावरुणा परि मामधातामिति पाणी प्रक्षालयते ॥३॥ वर्चसा मामित्याचामति ॥४॥ पुनः सव्येनाचमनादपसव्यं कृत्वा प्रैषकृतं समादि- शति ॥५॥ उलखलमुसलं शूर्पं चरुं कंसं प्रक्षालय बर्हि- रुदकुम्भमाहरेति ॥ ६ ॥ यज्ञोपवीती दक्षिणपूर्वमन्त- र्देशमभिमुखः शूर्प एकपवित्रान्तर्हितान्हविष्यान्निर्वपति ॥७॥ इदमग्नये कव्यवाहनाय स्वधा पितृभ्यः पृथि- वीषद्भ्य इतीदं सोमाय पितृमते स्वधा पितृभ्यः सोम- वद्भ्यः पितृभ्यो वान्तरिक्षसद्भ्य इतीदं यमाय पितृमते स्वधा पितृभ्यश्च दिविषद्भ्य इति त्रीनवाचोनकाशोन्नि- र्वपति ॥८॥ उलूखल ओप्य त्रिरवहन्तीदं वः पितरो हविरिति ॥६॥ यथा हविस्तथा परिचरति ॥१०॥ हवि- र्ह्येव पितृयज्ञः ॥११॥ प्रैषकृतं समादिशति चरुं प्रक्षालया- धिश्रयापं ओप्य तण्डुलानावपस्व नेक्षणेन योधय- स्मास्व मा शिरो ग्रहीः ॥१२॥ शिरोग्रहं पचिक्षते ॥१३॥ से प्रतीत होता है ॥२॥ “मित्रावरुणा परि मामधातां०” से दोनों हाथों को प्रक्षालन करे ॥३॥ और “वर्चसा मां०” से आचमन करे ॥४॥ पुनः वाम से आचमन कर दहिने करके प्रैषकृत् आदेश करे ॥५॥ उलूखल, मुसल, सूप, चरु, कटोरा, इनको प्रक्षालन करो, कुश और जल भरा कलश लाओ ॥६॥ तब यज्ञोपवीती होकर दक्षिण पूर्व दिशा के सम्मुख हो सूप में एक पवित्रे धरकर उसमें हविष्य पदार्थों को धर कर अग्नि में आहुति करे ॥७॥ इन मंत्रों को पढ़कर एक २ आहुति देवे “इदमग्नये कव्यवाहनाय०” इत्यादि और तीन मुट्ठी नीचे करके डाले ॥८॥ और उलूखल में हविष्य पदार्थ को डालकर “इदं वः पितरो हविः०” से मूसल से कूटे ॥९॥ जैसी हवि हो तदनुसार उसको करे ॥१०॥ क्योंकि हवि ही पितर हैं ॥११॥ प्रैष से आज्ञा देवे चरु को प्रक्षालन करो, पकाओ, उसमें जल डालकर चावलों को डालो, नेक्षण से अग्नि पर
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २११
बाह्येनोपनिष्क्रम्य यज्ञोपवीती दक्षिणपूर्वमन्तर्देशमभि- मुख उदीरतामिति कर्षू खनति प्रादेशमात्रीं तिर्यगङ्गु- रिम् ॥१४॥ अवागङ्गुरिं पर्वमात्रीमित्येके ॥१५॥ अपहता असुरा रक्षांसि ये पितृषद इति प्राग्दक्षिणं पांसून्नुदूह- हति ॥१६॥ कर्षूं च पाणी च प्रक्षाल्यैतद्वः पितरः पात्र- मिति कर्षूमुदकेन पूरयित्वा ॥१७॥ अन्तरुपातीत्य मस्तुना नवनीतेन वा प्रतिनिनीय दक्षिणाञ्चमुद्वास्य ॥ १८॥ द्वे काष्ठे गृहीत्वोशन्त इत्यादीपयति ॥१९॥ आदीप्त- योरेकं प्रतिनिदधाति ॥२०॥ इहैवैधि धनसनिरित्येकं हृत्वा ॥२१॥ पांसुष्वाधायोपसमादधाति ये निखाताः समिन्धते ये तातृषुर्यै सत्यास इति ॥२२॥ सम्भारानुप- सादयति ॥२३॥ पर्युक्षणीं बर्हिरुदकुम्भं कंसं दर्विमा- ज्यमायवनं चरुं वासांस्याञ्जनमभ्यञ्जनमिति ॥२४॥ यद्- चरु में चलाओ, शिर में कुछ बान्धे रहो क्योंकि इसका खण्डन वा प्रतिषेध है ॥१३॥ बाहर निकल कर यज्ञोपवीत पहन कर दक्षिण पूर्व की दिशा की ओर मुख करके “उदीरतां०” से प्रादेशमात्र लम्बी और अङ्गुरी परिमाण चौड़ी कर्षू खोदे ॥१४॥ तिर्यक् अंगुरी गहरा कर्षू हो ऐसा कतिपय आचार्य कहते हैं, या पर्वमात्र ॥१५॥ “अपहता असुरा रक्षांसि ये पितृषद०” से पूर्वदक्षिण कोण में धूलि को फेंके ॥१६॥ कर्षू और दोनों हाथों को प्रक्षालन करके” “एतद्वः पितरः पात्रं०” से कर्षू को जल से भर कर उसमें नवनीत या मस्तु डालकर दक्षिण की ओर उद्वासन करके ॥१७॥१८॥ दो काठों को लेकर “उशन्त०” से दोनों को आग से प्रज्वलित कर देवे । और जलते हुए दोनों में से एक को धर देवे ॥१९॥२०॥ “इहैवैधि धनसनिः” । से एक को लेकर पांसु में धर कर “ये निखाताः समिन्धते०” इत्यादि से आधान करे ॥२१॥२२॥ अब इस यज्ञ में प्रयोजनीय सामग्रियों को लावे ॥२३॥ पर्युक्षणी, बर्हिकुश, उदकुम्भ, कटोरा, दर्वि, आज्य, आयवन, चरु, कपड़े, अञ्जन, कजरौटा, और भी
२१२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
त्रोपसमाहार्यं भवति तदुपसमाहृत्य ॥ २५॥ अतो यज्ञो- पवीती पित्र्युपवीती बर्हिर्गृहीत्वा विवृत्य संनहनं दक्षिणापरमष्टमदेशमभ्यवास्येत् ॥ २६ ॥ बर्हिरुदकेन सम्प्रोक्ष्य बर्हिषदः पितर उपहूता नः पितरोऽग्निष्वात्ताः पितरो ये नः पितुः पितरो येऽस्माकमिति प्रस्तृणाति ॥२७॥ आयापनादीनि त्रीणि ॥२८॥ उदीरतामिति तिसृ- भिरुदपात्राण्यन्वृचं निनयेत् ॥ २९ ॥ अतः पित्र्युपवीती यज्ञोपवीती ये दस्यव इत्युभयत आदीप्तमुल्मुकं त्रिः प्रसव्यं परिहृत्य निरस्यति ॥३०॥ पर्युक्ष्य ॥३१॥८॥८७॥ ये रूपाणि प्रतिमुञ्चमाना असुराः सन्तः स्वधया चरन्ति। त्वं तानग्ने अप सेध दूरान्सत्या नः पितॄणां स- न्ह्वाशिषः स्वाहा स्वधेति हुत्वा कुम्भीपाकमभिघारयति ॥१॥ अग्नये कव्यवाहनायेति जुहोति ॥२॥ यथानिरुक्तं द्वितीयाम् ॥३॥ यमाय पितृमते स्वधा पितृभ्य इति
जो यहाँ लाना आवश्यक हो उन सब को लावे ॥२४॥२५॥ इसलिये यज्ञोपवीती, और उपवीती (प्राचीनावीती) हो बर्हिकुश को लेकर बर्हिकुशों को बिछाकर उस पर आयचन करे अर्थात् बर्हिको जल से संप्रोक्षण कर “बर्हिषदः पितरः०” इत्यादि से बर्हिकुश का आस्तरण करे॥२७॥ “आयात पितर.” यह ऋ०, “आच्या जानु०” यह ऋचा और “संविशन्तु०” यह ऋचा। इन तीन ऋचाओं से तिलों को बिखेर कर ॥२८॥उदीरतां०” इत्यादि तीन ऋचाओं से जलपात्रों में से एक २ को ऋचा पढ़ २ कर लावे ॥२९॥ इसलिये “पित्र्युपवीती यज्ञोपवीती ये दस्यवः०” से दोनों ओर जलते उल्मुक को तीन बार बायें होकर-घुमाकर डाल देवे और जल से पर्युक्षण कर देवे ॥३१॥८॥८७॥ यह सत्तासीवी कण्डिका खतम हुई ॥ “ये रूपाणि प्रतिमुञ्चमाना०” इत्यादि से स्वाहा, स्वधा लगाकर आहुति देकर कुम्भीपाक का अभिघार देवे ॥ १ ॥ “अग्नये कव्यवाह- नाय०” से आहुति करे ॥ २ ॥ “सोमाय पितृमते०” से दूसरी आहुति देवे ॥ २ ॥ “यमाय पितृमते स्वधा पितृभ्यः”। से तीसरी आहुति
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २१३ तृतीयाम् ॥ ४ ॥ यद्दो अग्निरिति सायवनांस्तण्डुलान् ॥५॥ सं बर्हिरिति सदर्भांस्तण्डुलान् पर्युक्ष्य ॥६॥ अतो यज्ञोपवीती पित्र्युपवीती दर्व्योद्धरति ॥७॥ द्यौर्दर्वीरक्षिता- परिमितानुपदस्ता सा यथा द्यौर्दर्वीरक्षितापरिमितानुप- दस्तैवा प्रततामहस्येयं दर्वीरक्षितापरिमितानुपदस्ता॥८॥ अन्तरिक्षं दर्वीरक्षितापरिमितानुपदस्ता सा यथान्तरिक्षं दर्वीरक्षितापरिमितानुपदस्तैवा ततामहस्येयं दर्वीरक्षि- तापरिमितानुपदस्ता ॥६॥ पृथिवी दर्वीरक्षितापरिमिता- नुपदस्ता सा यथा पृथिवी दर्वीरक्षितापरिमितानु- पदस्तैवा ततस्येयं दर्वीरक्षितापरिमितानुपदस्तेति ॥१०॥ उद्धृत्याज्येन संनीय त्रीन्पिण्डान् संहतान्निदधात्येतत्ते प्रततामहेति ॥११॥ दक्षिणतः पत्नीभ्य इदं वः पत्न्य इति ॥१२॥ इदमाशंसूनामिदमाशंसमानानां स्त्रीणां पुंसां प्रकीर्णावशीर्णानां येषां वयं दातारो ये चास्माकमुप- जीवन्ति । तेभ्यः सर्वेभ्यः सपत्नीकेभ्यः स्वधावदक्षय्य- मस्त्विति त्रिः प्रसव्यं तण्डुलैः परिकिरति ॥१३॥ पिञ्जू- लीराञ्जनं सर्पिषि पर्यस्याङ्ग्ध्वं पितर इति न्यस्यति ॥१४॥ देवे ॥ ४ ॥ “यद्दो अग्निः” से जौ के साथ चावलों “एवं संबर्हिः ” से सदर्भ तण्डुलों को पर्युक्षण करके अर्थात् “संबर्हिरुक्तं०” से सदर्भ चावलों की आहुति करे, तब पर्युक्षण करे ॥ ६ ॥ अतएव यज्ञोपवीती पित्र्युपवीती दर्वि से उद्धरण करे ॥ ७ ॥ “द्यौर्दर्वीरक्षिता०” इत्यादि मंत्रों से निकाल कर आज्य में मिलाकर 'तीन' पिण्डों को एक साथ “एतत्ते प्रततामह०” इत्यादि से ॥ ८ ॥ ६ ॥ १० ॥ ११ ॥ दक्षिण से पत्नियों के लिये “इदं वः पत्न्यः” इत्यादि ॥ १२ ॥ “इदमाशं०” इत्यादि तीन बार वाम होकर चावलों को बिखेर देवें ॥ १३ ॥ पिञ्जुली, आञ्जन, को घी में मिलाकर “अङ्ग्ध्वं पितरो०” से पिण्डों पर घरे ॥१४॥
२१४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । वद्ध्वं पितरो मा वोऽतोऽन्यत्पितरो योयुवतेति सूत्राणि ॥१५॥ अञ्जते व्यञ्जते इत्यभ्यञ्जनम् ॥१६॥ आज्येना- विच्छिन्नं पिण्डानभिघारयति ये च जीवा ये ते पूर्वे परागता इति ॥१७॥ अत्र पितरो मादयध्वं यथाभागं यथालोकमावृषायध्वमिति ॥१८॥ अत्र पत्न्यो माद- यध्वं यथाभागं यथालोकमावृषायध्वमिति ॥१९॥ यो- ऽसावन्तरग्निर्रभवति तं प्रदक्षिणमवेक्ष्य तिस्रस्तामीस्ता- म्यति ॥२०॥ प्रतिपर्यावृत्त्यामीमदन्त पितरौ यथाभागं यथालोकमावृषायिषतेति ॥२१॥ अमीमदन्त पत्न्यो यथाभागं यथालोकमावृषायिषतेति ॥२२॥ आपो अग्नि- मित्यङ्गिरग्निमवसिच्य ॥२३॥ पुत्रं पौत्रमभितर्पयन्ती- रित्याचामत मम प्रततामहास्ततामहास्तताः सपत्नीका- स्तृप्यन्त्वाचामन्त्विति प्रसव्यं परिषिच्य ॥२४॥ वीरान्मे प्रततामहा दत्त वीरान्मे ततामहा दत्त वीरान्मे पितरो दत्त पितॄन् वीरान्याचति ॥२५॥ नमो वः पितर इत्युपतिष्ठते ॥२६॥ अक्षन्नित्युत्तरसिचमवधूय ॥२७॥ परा यातेति “वद्ध्वं पितरो०” इत्यादि सूत्रों में है ॥ १५ ॥ “अञ्जते व्यञ्जत०” से अञ्जन धरे ॥ १६ ॥ आज्य से अविच्छिन्न पिण्डों का अभिघार करे । “ये च जीवा०” इत्यादि से ॥ १७ ॥ “अत्र पितर०” इत्यादि प्रति पिण्ड को देते समय जपता जावे ॥ १८ ॥ इसी प्रकार “अत्र पत्न्यो०” इत्यादि प्रति पत्नियों के पिण्ड को देते समय पढ़े ॥ १९ ॥ जो यह अन्तराग्नि को तीन २ बार प्रदक्षिण करके तीन २ बार प्राणायाम करता जावे ॥ २० ॥ और प्रत्येक बदलने में “अमीमदन्त०” इत्यादि पढ़ता आवे और प्रति पिण्ड में उपस्थान करता जावे ॥ २१ ॥ इसी प्रकार प्रति पत्नियों के पिण्डों में उपस्थान करता जावे ॥ २२ ॥ “आपो अग्नि०” इत्यादि से अग्नि को जल से अवसेचन करके ॥ २३ ॥ “पुत्रं पौत्रमभितर्पयन्ति०” से आचमन करे और “मम प्रततामहा०” से वाम होकर परिषेक करे ॥ २४ ॥ “वीरान्मे प्रततामहा०” इत्यादि से
परायापयति ॥२८॥ अतः पित्र्युपवीती यज्ञोपवीती यन्न इदं पितृभिः सह मनोऽभूत्तदुपान्हयामसीति मन उपाह्वयति ॥२९॥६॥८८॥ मनो न्वाव्हामहे नाराशंसेन स्तोमेन ॥ पितॄणां च मन्मभिः ॥ आ न एतु मनः पुनः क्रत्वे दक्षाय ॑जीवसे ज्योक्च सूर्यं दृशे ॥ पुनर्नः पितरो मनो ददातु दैव्यः जनः ॥ जीवं व्रातं सचेमहि ॥ वयं सोम व्रते तव मनस्त- नूषु बिभ्रतः । प्रजावन्तः सचेमहि ॥ ये सजाताः सुमनसो जीवा जीवेषु मामकाः । तेषां श्रीर्मयि कल्प- तामस्मिन्गोष्ठे शतं समा इति ॥१॥ यच्चरुस्थाल्यामोद- नावशिष्टं भवति तस्योष्मभक्षं भक्षयित्वा ब्राह्मणाय दद्यात् ॥२॥ यदि ब्राह्मणो न लभ्येताप्स्रवभ्यवहरेत् ॥३॥ निजाय दासायेत्येके ॥४॥ मध्यमपिण्डं पत्न्यै पुत्रकामाय प्रयच्छति ॥५॥ आधत्त पितरो गर्भं कुमारं पुष्करस्रजम् । यथेह पुरुषोऽसत् ॥ आ त्वारुक्षद्वृषभः पृश्निरप्रियो मेधा- विनं पितरो गर्भमादधुः ॥ आ ह्वायं पुरुषो गमेत्पुरुषः पुरुषादधि । स ते श्रैष्ठ्याय जायतां स सोमे साम गायत्विति ॥६॥ यद्यन्या द्वितीया भवत्यपरं तस्यै ॥७॥ पितरों का उपस्थान करे ॥ २५ ॥ २६ ॥ “अक्षन्न०” से उत्तरसिच को धोकर । “परायात०” से परायापन करे ॥ २८ ॥ “यन्न इदमिति मनो न्वाव्हामह” इत्यादि सूक्त के मन्त्रों को हृदय को छूकर जप करे ॥ २९ ॥ ६ ॥ ८८ ॥ यह अट्ठासिवी कण्डिका समाप्त हुई । “मनो न्वाव्हामहे” इत्यादि का जप करे ॥१॥ जो चरुस्थाली में ओदन रह जावे उसका ऊष्म भक्षण कराकर ब्राह्मण के लिये दे देवे ॥२॥ यदि ब्राह्मण न मिलें तो उसे जल में डाल देवे ॥३॥ अपने दास को दे देवे ऐसा किन्हीं आचार्यों का मत है ॥४॥ मध्यम पिण्ड को पुत्र की इच्छा वाली पत्नी के लिये देवे ॥५॥ “आधत्त पितरो गर्भं०” इत्यादि
, an anunasika or a svara mark can be placed over a letter. Whatever the reason, the glyph is clearly a candrabindu (ँ). Wait, is it on 'व'? Yes, "वँ". Wait, could it be "थ्याँवद्योर्जं"? The candrabindu's crescent is centered right above the 'व'. So: "थ्यावँद्योर्जं" or "थ्यावद्योर्जं"? Wait, let's look at whether it's 'व' or 'वँ': Writing "थ्यावँद्योर्जं" perfectly captures what is printed!
Wait, let's re-verify line 17: "इमं समिन्धिषीमह्याययुष्मन्तः सुवर्चसः ॥ त्वमग्न ईडित" Yes, "समिन्धिषीमह्याययुष्मन्तः".
Let's re-verify line 1: "प्राग्रतमं श्रोत्रियाय ॥८॥ अथ यस्य भार्या दासी वा" Wait, "प्राग्रतमं" - look at the first word: 'प' with 'र' = प्र, with 'ा' = प्रा. Then 'ग' with 'र' = ग्र. Then 'त' = त. Then 'मं' = मं. "प्राग्रतमं". Wait, in line 21 Hindi: "और जो यज्ञिया दूसरी होती
ह्वेतदाहिताग्नेः ॥१५॥ गृहेष्वनाहिताग्नेः ॥१६॥ इदं चिन्मे कृतमस्तीदं चिच्छक्रवानि । पितरश्चिन्मा वेद- न्निति ॥१७॥ यो ह यजते तं देवा विदुर्यो ददाति तं मनु- ष्यायः श्राद्धानि कुरुते तं पितरस्तं पितरः ॥१८॥१०॥८६॥ इत्यथर्ववेदे कौशिकसूत्रे एकादशोऽध्यायः समाप्तः ॥११॥ मधुपर्कमाहारयिष्यन् दर्भानाहारयति ॥१॥ अथ विष्टरान् कारयति ॥२॥ स खल्वेकशाखमेव प्रथमं पाद्यं द्विशाखमासनं त्रिशाखं मधुपर्काय ॥३॥ स यावतो मन्येत तावत उपादाय विविच्य संपर्याप्य मूलानि च प्रान्तानि च यथाविस्तीर्ण इव स्यादित्युपोत्कृष्य मध्य- देशेऽभिसंनह्यति ॥४॥ ऋतेन त्वा सत्येन त्वा तपसा त्वा कर्मणा त्वेति संनह्यति ॥५॥ अथ ह सृजत्यतिसृष्टो
प्रणीत हों तो दक्षिणाग्नि में यह होम कर्म आहिताग्नि का होगा ॥१५॥ और अनाहिताग्नि का अग्नि में होम घर ही में होगा ॥१६॥ “इदं चिन्मे कृतमस्ति०” मंत्र से अग्नि का उपस्थान करे ॥१७॥ जो कोई देवयज्ञ करता है उस को देवता जान लेते हैं, जो दान देता है उसको मनुष्य लोग जान लेते हैं, और जो श्राद्ध करता है उस को पितर लोग जानते हैं ॥१८॥१०॥८९॥ यह नवासिवी कण्डिका खतम हुई ॥ यह अथर्ववेद के कौशिकसूत्र का ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥११॥ मधुपर्क कर्म को कहते हैं । जब आचार्य्य यजमान के घर आते हैं तो यह कर्म होता है । मधुपर्क सामग्री लाते समय दर्भों को भी लावे ॥१॥ अब विष्टरों को बनवावे ॥२॥ यह पहिला काम है । पाद्य ( पैर धोने को जल ) दूसरा है, आसन और तीसरा है मधुपर्क ॥ सो जितना चाहे उतना लाकर अलग २ घरे और कुशों के जड़ एवं प्रान्त भाग बिछाने की भाँति घरे तो वहाँ से लेकर मध्य देश में कुशों को यथाविधि बान्धे ॥ “ऋतेन त्वा सत्येन त्वा०” इत्यादि से कुशों को इस भाँति बान्धे जिसमें बिछाने के काम में आवे ॥५॥ अब २८
२१८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । द्वेष्टा योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः ॥६॥ अस्य च दातुरिति दातारमीक्षते ॥७॥ अथोदकमाहारयति पाद्यं भो इति ॥८॥ हिरण्यवर्णाभिः प्रतिमन्त्र्य दक्षिणं पादं प्रथमं प्रकर्षति । मयि ब्रह्म च तपश्च धारयाणीति ॥९॥ दक्षिणे प्रक्षालिते सव्यं प्रकर्षति । मयि क्षत्रं च विशश्च धारयाणीति ॥१०॥ प्रक्षालितावनुमन्त्रयते । इमौ पादा- ववनिक्तौ ब्राह्मणं यशसावताम् ॥ आपः पादावनेजनी- र्द्विषन्तं निर्दहन्तु मे ॥११॥ अस्य च दातुरिति दातारमी- क्षते ॥१२॥ अथासनमाहारयति । सविष्टरमासनं भो इति ॥१३॥ तस्मिन्प्रत्यङ्मुख उपविशति ॥१४॥ विमृ- ग्वरीं पृथिवीमित्येतया विष्टरे पादौ प्रतिष्ठाप्याधिष्ठितो द्वेष्टा योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः ॥१५॥ अस्य च दातुरिति दातारमीक्षते ॥१६॥ अथोदकमाहारयत्यर्घ्यं भो इति ॥१७॥ तत्प्रतिमन्त्रयते । अन्नानां मुखमसि मुख- विष्टर को बनाते समय “अतिसृष्टो द्वेष्टा यो०” इत्यादि का जप करे । मधुपर्क के दाता को अर्घ्यव्यक्ति देखे । तब दाता जल लाकर कहे “पाद्यं भोः” ( जल है भगवन् ) “हिरण्यवर्णाभिः०” से अभिमंत्रण करके अर्घ्य के दहिने पग को दाता या उसका दास हाथ से खींचकर “मयि ब्रह्म च०” इत्यादि पढ़कर ( पुरोहितादि ) दहिने पैर को धो लेने पर बायें पैर को खींचकर “मयि क्षत्रं च०” इत्यादि पढ़े ॥६॥७॥८॥९॥ ॥१०॥ दोनों पैरों को धो लेने पर अनुमंत्रण करे—“इमौ पादाववनिक्तौ ब्राह्मणं यशसावताम् । आपः पादावनेजनीर्द्विषन्तं निर्दहन्तु मे” ॥११॥ “अस्य च दातुः०” से दाता को अर्घ्य पुरुष देखे ॥१२॥ तब दाता आसन लाकर “सविष्टरमासनं भो” कहे तब अर्घ्य पुरुष उस पर पश्चिमाभिमुख बैठे “विमृग्वरीं पृथिवीं०” इससे विष्टर पर पैरों को धरकर ठीक से बैठ जावे ॥ “द्वेष्टा यो०” इत्यादि पढ़े ॥१५॥ “अस्य च दातुः” से दाता को अर्घ्य देखे ॥१६॥ तब जल लाकर दाता बोले
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २१९ महं श्रेष्ठः समानानां भूयासम् । आपोऽमृतं स्थामृतं मा कृणुत दासास्माकं बहवो भवन्त्वश्वावद्रोमन्मय्यस्तु पुष्टमों भूर्भुवःस्वर्जनदोमिति ॥१८॥ तूष्णीमध्यात्मं निनयति॥१९॥ तेजोऽस्यमृतमसीति ललाटमालभते॥२०॥ अथोदकमाहारयत्याचमनीयं भो इति ॥२१॥ जीवाभि- राचम्य ॥२२॥ अथास्मै मधुपर्कं वेदयन्ते द्वयनुचरो मधुपर्को भो इति ॥२३॥ द्वाभ्यां शाखाभ्यामधस्तादेक- योपरिष्टात्सपिधानम् ॥२४॥ मधु वाता ऋतायत इत्येताभिरेवाभिमन्त्रणम् ॥२५॥ तथा प्रतिमन्त्रणम् ॥२६॥॥९०॥ मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वी- र्गावो भवन्तु नः। मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिवं रजः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः॥ मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँ अस्तु सूर्यः । मधु द्यौरस्तु नः पिता ॥१॥ तत्सूर्यस्य त्वा चक्षुषा प्रतीक्ष इति प्रतीक्षते ॥२॥ अयुतोऽहं देवस्य त्वा सवितु- रिति प्रतिगृह्य पुरोमुखं प्राग्दण्डं निदधाति ॥३॥ पृथि- व्यास्त्वा नाभौ सादयाम्यदित्या उपस्थ इति भूमौ प्रति- “अर्घ्यं भोः” उसको “अन्नानां मुख०” इत्यादि से अनुमंत्रण करे ॥१८॥ और तूष्णीं अर्घ्य की अञ्जलि को दाता लावे ॥१९॥ “तेजोऽस्यमृत- मसि०” से अर्घ्य के ललाट का स्पर्श करे ॥२०॥ अब अर्घ्य के लिये मधुपर्क को लावे—एक छोटे कटोरे में मधुपर्क (दही, मधु, घी) धर कर उसपर बड़े कटोरे से ढाककर अनुचर लाकर बोले “मधुपर्को भोः” ॥२१॥२२॥२३॥२४॥ “मधु वाता ऋतायते०” इत्यादि से अभिमंत्रण करे ॥२५॥ और प्रतिमंत्रण करे ॥२६॥॥९०॥ यह नब्बेवी कण्डिका पूरी हुई ॥ उक्त मंत्रों से देखे ॥१॥२॥ “अयुतोऽहं देवस्य०” इत्यादि से मधुपर्क को लेकर पूर्व मुख हो दण्ड को धर देवे ॥३॥ “पृथिव्यास्त्वा०” इत्यादि
२२० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ष्ठाप्य॥४॥ द्वाभ्यामङ्गुलीभ्यां प्रदक्षिणमाचाल्यानामिकया- ङ्गुष्ठ्याङ्गुष्ठेन च संगृह्य प्राश्नाति ॥५॥ ओं भूस्तत्सवितु- र्वरेण्यं भूः स्वाहेति प्रथमम् ॥६॥ भर्गो देवस्य धीमहि भुवः स्वाहेति द्वितीयम् ॥७॥ धियो यो नः प्रचोदयात्स्वः स्वाहेति तृतीयम् ॥८॥ वयं देवस्य धीमहि जनत्स्वाहेति चतुर्थम् ॥९॥ तुरं देवस्य भोजनं वृधत्स्वाहेति पञ्चमम् ॥१०॥ करत्स्वाहेति षष्ठम् ॥११॥ रुहत्स्वाहेति सप्तमम् ॥१२॥ महत्स्वाहेत्यष्टमम् ॥१३॥ तत्स्वाहेति नवमम्॥१४॥ शं स्वाहेति दशमम्॥१५॥ ओमित्येकादशम्॥१६॥ तूष्णीं द्वादशम् ॥१७॥ तस्य भूयोमात्रमिव भुक्त्वा ब्राह्मणाय श्रोत्रियाय प्रयच्छेत् ॥१८॥ श्रोत्रियालाभे वृषलाय प्रय- च्छेत् ॥१९॥ अथाप्यर्थं निगमो भवति। सोममेतत्पिबत यत्किं चाश्नीत ब्राह्मणाः। माब्राह्मणायोच्छिष्टं दात मा सोमं पाध्वसोमप इति ॥२०॥२॥६१॥ से उसको भूमि पर धर कर दोनो अङ्गुलियो से प्रदक्षिण कटोरे में के मधुपर्क को चलाकर अनामिका अङ्गुली और अंगूठे से लेकर चाटे ॥५॥ “ओं भूस्तत्सवितुर्वरेण्यं भूः स्वाहा” से पहिली बार । “भर्गो देवस्य धीमहि भुवः स्वाहा” से दूसरी बार । “धियो यो नः प्रचोदयात् स्वः स्वाहा” से तीसरी बार ॥८॥ “वयं देवस्य०” से चौथी वार ॥९॥ “तुरं देवस्य भोजनं०” से पञ्चम बार ॥१०॥ “करत्स्वाहा” से छठी बार ॥११॥ “रुहत्स्वाहा” से सप्तम बार ॥१२॥ “महत्स्वाहा” से अष्टम बार ॥१३॥ “तत्स्वाहा” से नवम बार ॥१४॥ “शं स्वाहा” से दशम बार ॥१५॥ “ओं” से ग्यारहवीं बार ॥१६॥ तूष्णीं बारहवी बार ।१७॥ उसको बड़ी मात्रा से खाकर श्रोत्रिय ब्राह्मण के लिये दे देवे ॥१८॥ यदि श्रोत्रिय न मिलें तो वृषल को देवे ॥१९॥ यहां पर निगम का प्रमाण भी है। यह जो ब्राह्मण पीता है, वह सोम पीता है। ब्राह्मण को उच्छिष्ट न देवे और न असोमप को सोम पीने को देवे ॥२०॥२॥९१॥ यह एक्यानबेवी कण्डिका खतम हुई ।
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २२१ दधि च मधु च ब्राह्मो मधुपर्कः ॥१॥ पायस ऐन्द्रो मधुपर्कः ॥२॥ मधु चाज्यं च सौम्यो मधुपर्कः ॥३॥ मन्थश्चाज्यं च पौष्णो मधुपर्कः ॥४॥ क्षीरं चाज्यं च सारस्वतो मधुपर्कः ॥५॥ सुरा चाज्यं च मौसलो मधु- पार्कः ॥६॥ स खल्वेष द्वये भवति सौत्रामण्यां च राज- सूये च ॥७॥ उदकं चाज्यं च वारुणो मधुपकः ॥८॥ तैलं चाज्यं च श्रावणो मधुपर्कः ॥९॥ तैलञ्च पिण्डञ्च पारि- व्राजको मधुपर्कः ॥१०॥ इति खल्वेष नवविधो मधुपर्को भवति ॥११॥ अथास्मै गां वेदयन्ते गौर्भो इति ॥१२॥ तान्प्रतिमन्त्रयते । भूतमसि भवदस्यन्नं प्राणो बहुर्भव । ज्येष्ठं यन्नाम नामत ओं भूर्भुवः स्वर्जनदोमिति ॥१३॥ अतिसृजति । मातादित्यानां दुहिता वसूनां स्वसा रुद्रा- णाममृतस्य नाभिः । प्र णो वोचं चिकितुषे जनाय मा गामनागामदितिं वधिष्ट ॥ ओं तृणानि गौरत्त्वित्याह ॥१४॥ सूयवसादिति प्रतिष्ठमानामनुमन्त्रयते ॥१५॥ ना- लोहितो मधुपर्को भवति ॥१६॥ नानुज्ञानमधीमह इति दही और मधु ब्राह्म मधुपर्क है । १॥ पायस ऐन्द्र मधुपर्क है ॥२॥ मधु एवं घृत सौम्य मधुपर्क है। ३॥ मन्थ और आज्य पौष्ण मधुपर्क है॥४॥ क्षीर और आज्य सारस्वत मधुपर्क है । ५॥ मदिरा और घृत मोसल मधु- पर्क है ॥६॥ सो यह दो ही यज्ञों में होता है एक सौत्रामणी में और दूसरा राजसूय यज्ञ में ॥ ७ ॥ जल और घृत का वारुण मधुपर्क होता है ॥ ८ ॥ तैल और आज्य श्रावण मधुपर्क होता है । ९ ॥ तैल और पिण्ड पारिव्राजक मधुपर्क है ॥ १० ॥ इस प्रकार मधुपर्क नौ प्रकार का होता है ॥ ११ ॥ यहाँ गो लाई जाती है—गौर्भोः ॥ इसका प्रतिमंत्रण “भूतमसि०” इत्यादि पढ़ कर गौ को छोड़ देवे। छोड़ते समय “मातादित्यानां०” इत्यादि पढ़कर गौ को छोड़ देवे “वह घास खावे”—ऐसा कहे ॥१४॥ “सूयवसात्०” से गौ को प्रतिष्ठ- मान करते हुए अनुमंत्रण करे ॥ १५ ॥ बिना मांस के मधुपर्क नहीं