कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ऽहनि विज्ञायते ॥२॥ मित्रावरुणा परि मामधातामिति पाणी प्रक्षालयते ॥३॥ वर्चसा मामित्याचामति ॥४॥ पुनः सव्येनाचमनादपसव्यं कृत्वा प्रैषकृतं समादि- शति ॥५॥ उलखलमुसलं शूर्पं चरुं कंसं प्रक्षालय बर्हि- रुदकुम्भमाहरेति ॥ ६ ॥ यज्ञोपवीती दक्षिणपूर्वमन्त- र्देशमभिमुखः शूर्प एकपवित्रान्तर्हितान्हविष्यान्निर्वपति ॥७॥ इदमग्नये कव्यवाहनाय स्वधा पितृभ्यः पृथि- वीषद्भ्य इतीदं सोमाय पितृमते स्वधा पितृभ्यः सोम- वद्भ्यः पितृभ्यो वान्तरिक्षसद्भ्य इतीदं यमाय पितृमते स्वधा पितृभ्यश्च दिविषद्भ्य इति त्रीनवाचोनकाशोन्नि- र्वपति ॥८॥ उलूखल ओप्य त्रिरवहन्तीदं वः पितरो हविरिति ॥६॥ यथा हविस्तथा परिचरति ॥१०॥ हवि- र्ह्येव पितृयज्ञः ॥११॥ प्रैषकृतं समादिशति चरुं प्रक्षालया- धिश्रयापं ओप्य तण्डुलानावपस्व नेक्षणेन योधय- स्मास्व मा शिरो ग्रहीः ॥१२॥ शिरोग्रहं पचिक्षते ॥१३॥ से प्रतीत होता है ॥२॥ “मित्रावरुणा परि मामधातां०” से दोनों हाथों को प्रक्षालन करे ॥३॥ और “वर्चसा मां०” से आचमन करे ॥४॥ पुनः वाम से आचमन कर दहिने करके प्रैषकृत् आदेश करे ॥५॥ उलूखल, मुसल, सूप, चरु, कटोरा, इनको प्रक्षालन करो, कुश और जल भरा कलश लाओ ॥६॥ तब यज्ञोपवीती होकर दक्षिण पूर्व दिशा के सम्मुख हो सूप में एक पवित्रे धरकर उसमें हविष्य पदार्थों को धर कर अग्नि में आहुति करे ॥७॥ इन मंत्रों को पढ़कर एक २ आहुति देवे “इदमग्नये कव्यवाहनाय०” इत्यादि और तीन मुट्ठी नीचे करके डाले ॥८॥ और उलूखल में हविष्य पदार्थ को डालकर “इदं वः पितरो हविः०” से मूसल से कूटे ॥९॥ जैसी हवि हो तदनुसार उसको करे ॥१०॥ क्योंकि हवि ही पितर हैं ॥११॥ प्रैष से आज्ञा देवे चरु को प्रक्षालन करो, पकाओ, उसमें जल डालकर चावलों को डालो, नेक्षण से अग्नि पर