भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

पृष्ठ 241, कुल 361 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 241

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २०९ निन्द ऋतुमिस्यातः ॥१७॥ समिन्धत इति पश्चात्संकसु- कमुद्दीपयति ॥१८॥ अस्मिन्वयं यदिप्रं सीसे मृद्बहमित्य- भ्यवनेजयति ॥१९॥ कृष्णोर्णया पाणिपादान्निमृज्य ॥२०॥ इमे जीवा उदीचीनैरिति मन्त्रोक्तम् ॥२१॥ त्रिःसप्तेति कूड्या पदानि योपयित्वा श्मशानात् ॥२२॥ मृत्योः पदमिति द्वितीयया नावः॥२३॥ परं मृत्यो इति प्राग्दक्षिणं कूदीं प्रवि- ध्य ॥ २४ ॥ सप्त नदीरूपाणि कारयित्वोदकेन पूरयित्वा ॥२५॥ आरोहत सवितुर्नावमेतां सुत्रामाणं महीम् ष्विति सहिरण्यां सयवां नावमारोहयति ॥ २६ ॥ अश्मन्वती- रीयत उत्तिष्ठता प्रतरता सखाय इत्युदीचस्तारयति ॥ २७ ॥ शर्कराया समिदाधानात् ॥ २८ ॥ वैवस्वतादि समानम् ॥ २९ ॥ प्राप्य गृहान्समानः पिण्डपितृयज्ञः ॥३०॥[८६॥ अथ पिण्डपितृयज्ञः ॥१॥ अमावास्यायां सायं न्यन्हे- स्थान करे ॥१७॥ "समिन्धत०" से पश्चात् संकसुंक को जला देवे ॥१८॥ "अस्मिन्वयं यदिप्रं०" से अवनेजन करे ॥१९॥ काले सूत से हाथ पैर को मार्जन करके "इमे जीवा०" से गोत्र के लोग "त्रिः सप्त०" से कूदी से पैर को छिपाकर श्मशानभूमि से नदियों की ओर नावे ॥२०॥२१॥२२॥ "मृत्योः पदं०" इस दूसरी ऋचा से नाव को लावे । "परं मृत्योः” से प्रदक्षिणा कर कूदी को छेदे । और सात नदियों के समान बनवा कर उनमें जल भरवा देवे । और "आरोहत०" इत्यादि मंत्र पढ़कर सोने एवं जौ के साथ नाव पर सवार करवावे ॥२३॥२४॥२५॥२६॥ "अश्म- न्वती०" इत्यादि से उत्तर दिशा में उतरवा देवे ॥२७॥ शर्करादि, समि- दाधान से लेकर यमव्रत तक सारे कर्म पूर्ववत् यहाँ भी होंगे ॥२८॥२९॥ ३०॥७।८६॥ यह छियासीवी कण्डिका समाप्त हुई ॥ अब पिण्ड पितृयज्ञ के विषय में कहेंगे ॥१॥ इस यज्ञ के करने का समय अमावास्या को सायंकाल और अपराह्न में है ऐसा ब्राह्मण ग्रन्थ २७