भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

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अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २११

बाह्येनोपनिष्क्रम्य यज्ञोपवीती दक्षिणपूर्वमन्तर्देशमभि- मुख उदीरतामिति कर्षू खनति प्रादेशमात्रीं तिर्यगङ्गु- रिम् ॥१४॥ अवागङ्गुरिं पर्वमात्रीमित्येके ॥१५॥ अपहता असुरा रक्षांसि ये पितृषद इति प्राग्दक्षिणं पांसून्नुदूह- हति ॥१६॥ कर्षूं च पाणी च प्रक्षाल्यैतद्वः पितरः पात्र- मिति कर्षूमुदकेन पूरयित्वा ॥१७॥ अन्तरुपातीत्य मस्तुना नवनीतेन वा प्रतिनिनीय दक्षिणाञ्चमुद्वास्य ॥ १८॥ द्वे काष्ठे गृहीत्वोशन्त इत्यादीपयति ॥१९॥ आदीप्त- योरेकं प्रतिनिदधाति ॥२०॥ इहैवैधि धनसनिरित्येकं हृत्वा ॥२१॥ पांसुष्वाधायोपसमादधाति ये निखाताः समिन्धते ये तातृषुर्यै सत्यास इति ॥२२॥ सम्भारानुप- सादयति ॥२३॥ पर्युक्षणीं बर्हिरुदकुम्भं कंसं दर्विमा- ज्यमायवनं चरुं वासांस्याञ्जनमभ्यञ्जनमिति ॥२४॥ यद्- चरु में चलाओ, शिर में कुछ बान्धे रहो क्योंकि इसका खण्डन वा प्रतिषेध है ॥१३॥ बाहर निकल कर यज्ञोपवीत पहन कर दक्षिण पूर्व की दिशा की ओर मुख करके “उदीरतां०” से प्रादेशमात्र लम्बी और अङ्गुरी परिमाण चौड़ी कर्षू खोदे ॥१४॥ तिर्यक् अंगुरी गहरा कर्षू हो ऐसा कतिपय आचार्य कहते हैं, या पर्वमात्र ॥१५॥ “अपहता असुरा रक्षांसि ये पितृषद०” से पूर्वदक्षिण कोण में धूलि को फेंके ॥१६॥ कर्षू और दोनों हाथों को प्रक्षालन करके” “एतद्वः पितरः पात्रं०” से कर्षू को जल से भर कर उसमें नवनीत या मस्तु डालकर दक्षिण की ओर उद्वासन करके ॥१७॥१८॥ दो काठों को लेकर “उशन्त०” से दोनों को आग से प्रज्वलित कर देवे । और जलते हुए दोनों में से एक को धर देवे ॥१९॥२०॥ “इहैवैधि धनसनिः” । से एक को लेकर पांसु में धर कर “ये निखाताः समिन्धते०” इत्यादि से आधान करे ॥२१॥२२॥ अब इस यज्ञ में प्रयोजनीय सामग्रियों को लावे ॥२३॥ पर्युक्षणी, बर्हिकुश, उदकुम्भ, कटोरा, दर्वि, आज्य, आयवन, चरु, कपड़े, अञ्जन, कजरौटा, और भी