कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २१९ महं श्रेष्ठः समानानां भूयासम् । आपोऽमृतं स्थामृतं मा कृणुत दासास्माकं बहवो भवन्त्वश्वावद्रोमन्मय्यस्तु पुष्टमों भूर्भुवःस्वर्जनदोमिति ॥१८॥ तूष्णीमध्यात्मं निनयति॥१९॥ तेजोऽस्यमृतमसीति ललाटमालभते॥२०॥ अथोदकमाहारयत्याचमनीयं भो इति ॥२१॥ जीवाभि- राचम्य ॥२२॥ अथास्मै मधुपर्कं वेदयन्ते द्वयनुचरो मधुपर्को भो इति ॥२३॥ द्वाभ्यां शाखाभ्यामधस्तादेक- योपरिष्टात्सपिधानम् ॥२४॥ मधु वाता ऋतायत इत्येताभिरेवाभिमन्त्रणम् ॥२५॥ तथा प्रतिमन्त्रणम् ॥२६॥॥९०॥ मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वी- र्गावो भवन्तु नः। मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिवं रजः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः॥ मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँ अस्तु सूर्यः । मधु द्यौरस्तु नः पिता ॥१॥ तत्सूर्यस्य त्वा चक्षुषा प्रतीक्ष इति प्रतीक्षते ॥२॥ अयुतोऽहं देवस्य त्वा सवितु- रिति प्रतिगृह्य पुरोमुखं प्राग्दण्डं निदधाति ॥३॥ पृथि- व्यास्त्वा नाभौ सादयाम्यदित्या उपस्थ इति भूमौ प्रति- “अर्घ्यं भोः” उसको “अन्नानां मुख०” इत्यादि से अनुमंत्रण करे ॥१८॥ और तूष्णीं अर्घ्य की अञ्जलि को दाता लावे ॥१९॥ “तेजोऽस्यमृत- मसि०” से अर्घ्य के ललाट का स्पर्श करे ॥२०॥ अब अर्घ्य के लिये मधुपर्क को लावे—एक छोटे कटोरे में मधुपर्क (दही, मधु, घी) धर कर उसपर बड़े कटोरे से ढाककर अनुचर लाकर बोले “मधुपर्को भोः” ॥२१॥२२॥२३॥२४॥ “मधु वाता ऋतायते०” इत्यादि से अभिमंत्रण करे ॥२५॥ और प्रतिमंत्रण करे ॥२६॥॥९०॥ यह नब्बेवी कण्डिका पूरी हुई ॥ उक्त मंत्रों से देखे ॥१॥२॥ “अयुतोऽहं देवस्य०” इत्यादि से मधुपर्क को लेकर पूर्व मुख हो दण्ड को धर देवे ॥३॥ “पृथिव्यास्त्वा०” इत्यादि