भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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पृष्ठ 254

२२२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । कुरुतेत्येव ब्रूयात् ॥१७॥ स्वधिते मैनं हिंसीरिति शस्त्रं प्रयच्छति ॥१८॥ पाप्मानं मेऽप जहीति कर्त्तारमनुमन्त्रयते ॥१९॥ आग्नेयीं वपां कुर्युः ॥२०॥ अपि वा ब्राह्मण एव प्राश्नीयात्तद्देवतं हि तद्धविर्भवति ॥२१॥ अथास्मै स्नानमनुलेपनं मालाभ्यञ्जनमिति ॥२२॥ यदत्रोपसमाहार्यं भवति तदुपसमाहृत्य ॥२३॥ अथोपासकाः प्राप्योपास- काः स्मो भो इति वेदयन्ते ॥२४॥ तान् प्रतिमन्त्रयते । भूयांसो भूयास्म ये च नो भूयसः कार्ष्ठापि च नोऽन्ये भूयांसो जायन्ताम् ॥२५॥ अस्य च दातुरिति दातार- मीक्षते ॥२६॥ अथान्नाहाराः प्राप्यान्नाहाराः स्मो भो इति वेदयन्ते ॥२७॥ तान्प्रतिमन्त्रयते । अन्नादा भूया- स्म ये च नोऽन्नादान्कार्ष्ठापि च नोऽन्येऽन्नादा भूयांसो जायन्ताम् ॥२८॥ अस्य च दातुरिति दातारमीक्षते ॥२९॥ आहृतेऽन्ने जुहोति यत्काम कामयमाना इत्येतया ॥३०॥ यत्काम कामयमाना इदं कृण्मसि ते हविः । तन्नः सर्वं होता है ॥१६॥ हम लोग विधि का उल्लङ्घन नहीं कर सकते अतएव “करो” ऐसा ही बोले ॥१७॥ “स्वधिते मैनं हिंसीः०” से शस्त्र को देवे ॥ १८॥ “पाप्मानं मेऽपजहि” से कर्त्ता को अनुमंत्रण करे ॥१९॥ आग्नेयी वपा को करें ॥२०॥ या ब्राह्मण ही खावे उसी देवताक हवि होती है ॥२१॥ इसके लिये स्नान, चन्दन, अनुलेपन, माला, अञ्जन लावे ॥२२॥ जो २ पदार्थ इसके लिये लाना पड़े उस २ को पहिले से लाकर घरे ॥२३॥ वस्त्रादि अलंकार सहित सब लाकर सब अर्ध्य को देवे और कहे कि “हमलोग आप के उपासक हैं” यह दाता कहे ।॥२४॥ उनको प्रतिमंत्रण करे—“भूयांसो भूयास्म०” इत्यादि पढ़कर इसके दाता को देखे ॥२५॥२६॥ अब कहते हैं “अन्नाहाराः प्राप्यान्नाहाराः स्मो भो” ऐसा जतळावे ॥२७॥ इनको प्रतिमंत्रण करे “भूयास्म०” इत्यादि पढ़े ॥ “अस्य च दातुः०” से दाता को देखे ॥२८॥२९॥ अन्न लाने पर “यत्काम०”