कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
DevanagariHindipublished361 पृष्ठ
पृष्ठ 255, कुल 361 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 255
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २२३
समृद्ध्यतामथैतस्य हविषो वीहि स्वाहेति ॥३१॥ एष आचा-
र्यकल्प एष ऋत्विकल्प एष संयुक्तकल्प एष विवाह-
कल्प एषोऽतिथिकल्पो एषोऽतिथिकल्पः ॥३२॥३॥९२॥
इत्यथर्ववेदे कौशिकसूत्रे द्वादशोऽध्यायः समाप्तः ॥१२॥
अथाद्भुतानि ॥१॥ वर्षे ॥२॥ यक्षेषु ॥३॥ गोमायुवद-
ने ॥४॥ कुल कलहिनि ॥५॥ भूमिचले ॥६॥ आदित्योप-
प्लवे ॥७॥ चन्द्रमसश्च ॥८॥ औपस्यामनुद्यस्याम् ॥६॥
समायां दारुणायाम् ॥१०॥ उपतारकशङ्कायाम् ॥११॥
ब्राह्मणेष्ववायुषिषु ॥१२॥ दैवतेषु नृत्यत्सु च्योतत्सु
हसत्सु गायत्सु ॥१३॥ लाङ्गल्योः संसर्गे ॥१४॥ रज्ज्वो-
इस ऋचा से आहुति करे ॥ ३० ॥ “यत्काम कामयमाना०” इत्यादि से
आहुति करे ॥३१॥ यह आचार्यकल्प है, यह ऋत्विक् कल्प है।
यह संयुक्त कल्प है, यह विवाह कल्प है और यह अतिथि कल्प है
यह अतिथिकल्प है ॥३२॥३॥९२॥ यह ब्यानबेवी कण्डिका खतम हुई ॥
यह अथर्ववेद के कौशिकसूत्र का बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥१२॥
अद्भुत् के विषय में कहेंगे। अद्भुत् की परिभाषा यह है कि जो
संसार में स्वभावतः जो कर्म-क्रियायें होती हैं, कभी २ कुछ आश्चर्यमय
लोकविरुद्ध क्रिया हो पड़ती है उसको “अद्भुत्” कहते हैं ॥ ऐसे अद्भुत्
कायों की जहाँ यथाविधि शान्ति नहीं होती है वहाँ दोष होता है।
जहाँ अद्भुत् होता है वहाँ दुःख होता है, नाश होता है। विनाश होने
की सूचना के लिये देवता लोग अद्भुत् को सृजन करते हैं ॥१॥ जल
की वृष्टि में, यक्षों के उपद्रव में, शृगाल के बोलने में, परिवार में परस्पर
झगड़ने में, भूकम्प में, चन्द्र और सूर्य्यग्रहण में ॥२॥३॥४॥५॥६॥७॥८॥
उषा के न उगने में, दारुणसंवत्सर में, दुर्भिक्ष और हैजा प्लेगादि
मारक में, उपतारक के सन्देह में, ब्राह्मणों के शस्त्रास्त्र ग्रहण में ॥९॥
॥१०॥११॥१२॥ जहाँ देवमूर्तियाँ या आकाश में देवगण नाच करें, अपनी
जगह से हटजावें, हँसे, गान करें या अन्य २ रूपों को धारण करें ॥१३॥
दो हलों का संसर्ग हो जावे ॥१४॥ दो अलग २ रज्जुश्रों का संसर्ग,