कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । स्तन्हयोश्च ॥१५॥ अग्निसंसर्गे ॥१६॥ यमवत्सायां गवि ॥१७॥ वडवागर्दभ्योर्मानुष्यां च ॥१८॥ यत्र धेनवो लोहितं दुहते ॥१९॥ अनडुहि धेनुं धयति ॥२०॥ धेनौ धेनुं धय- न्त्याम् ॥२१॥ आकाशफेने ॥२२॥ पिपीलिकानाचारे॥२३॥ नीलमक्षानाचारे ॥२४॥ मधुमक्षानाचारे ॥२५॥ अनाज्ञाते ॥२६॥ अवदीर्णे ॥२७॥ अनुदक उदकोन्मीले ॥२८॥ तिलेषु समतैलेषु ॥२९॥ हविःष्वभिमृष्टेषु ॥३०॥ प्रसव्येष्ववाव- र्तेषु ॥३१॥ यूपे विरोहति ॥३२॥ उल्कायाम् ॥३३॥ धूम- केतौ सप्तर्षीनुपधूपयति ॥३४॥ नक्षत्रेषु पतापतेषु ॥३५॥ मांसमुखे निपतति ॥३६॥ अनग्नाववभासे ॥३७॥ अग्नौ श्वसति ॥३८॥ सर्पिषि तैले मधुनि च विष्यन्दे ॥३९॥ ग्राम्येऽग्नौ शालां दहति ॥४०॥ आगन्तौ च ॥४१॥ वंशे स्फोटति ॥४२॥ कुम्भोदधाने विकसत्युखायां सक्तुधान्यां च ॥४३॥१॥६३॥ दो भिन्न २ अग्नियों का संसर्ग ॥१५॥ गौ को एक साथ दो बच्चा हो, इसी प्रकार, घोड़ी, गदही और मनुष्य की स्त्री को हो तो ॥१८॥ जहाँ गौ को दूध की जगह रुधिर हो, बैल बैल से मैथुन करे, गौ गौ से मैथुन करे ॥१६॥२०॥२१॥ आकाश में फेन हो, चूँटियों के अनाचार में, नीले रंग की मक्खियों के अनाचार में, मधुमक्खियों के अनाचार में, अना- ज्ञात-उपद्रव में, किसी पदार्थ के एकाएक फटने आदि में, जहाँ जल न हो वहाँ जल होने में, जितना तिल हो उससे उतना ही तैल होने में ॥२२॥२९॥ वपा या हवियों को चिड़ियाँयें या दो पद या चतुष्पद जन्तु लेकर भाग जाने में, कुमार या कुमारी दो आवर्त्त मूर्द्धन्य हों, एक सव्यावृत् और दूसरा देशावृत्त हो, यज्ञयूप के टूट जाने पर, दिन-में उल्का पात होने पर, सप्तर्षि ताराओं को धूमकेतु अपने प्रकाश से छिपा देवे, नक्षत्रों के गिरने पर, मांस मुख गिरने पर, बिना आग के धुआँ आना, अग्नि में श्वास-सा चलना, घी, तेल और मधु में विष्यन्दन होवे, गाँव के अग्नि से शाला जल जाने पर, आगन्तु के आग लगाने पर, वंश