कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २२५ अथ यत्रैतानि वर्षाणि वर्षन्ति घृतं मांसं मधु च यद्धिर- ण्यं यानि चाप्यन्यानि घोराणि वर्षाणि वर्षन्ति तत्परा- भवति कुलं वा ग्रामो वा जनपदो वा ॥१॥ तत्र राजा भूमिपतिर्विद्वांसं ब्रह्माणमिच्छेत् ॥२। एष ह वै विद्वान्य- द्भृग्वङ्गिरोवित् ॥३॥ एते ह वा अस्य सर्वस्य शमयितारः पालयितारो यद्भृग्वङ्गिरसः ॥४॥ स आहोपकल्पयध्व- मिति ॥५॥ तदुपकल्पयन्ते कंसमहते वसने शुद्धमाज्यं शान्ता ओषधीर्नवमुदकुम्भम् ॥६॥ त्रीणि पर्वाणि कर्मणः पौर्णमास्यमावास्ये पुण्यं नक्षत्रम् ॥७॥ अपि चेदेव यदा कदाचिदार्ताय कुर्यात् ॥८॥ स्नातोऽहतवसनः सुरभि- र्व्रतवान् कर्मण्य उपवसत्येकरात्रं त्रिरात्रं षड्रात्रं द्वादश- रात्रं वा ॥९॥ द्वादश्याः प्रातर्यत्रैवादः पतितं भवति तत में शब्द हो, कुम्भ के रखने सक्तुधानी या उखा या अनिङ्गिता विकसित हो, ये अद्भुत कार्य्य हैं ॥४३॥१॥६३॥ यह तिरानबेवी कण्डिका खतम हुई ॥ जहाँ वर्षा में ये पदार्थ वर्षैं घृत, मांस, मधु, सोना, और भी जो घोर वस्तुओं की वृष्टि हो वहाँ अत्यन्त दुःख होता है, चाहे कुल, ग्राम, जनपद क्यों न हो सबको कष्ट होता है ॥१॥ ऐसे स्थान में, राजा, भूमि- पति विद्वान् ब्राह्मण की इच्छा करे ॥२॥ विद्वान् वही है जो भृगु-आङ्गिरस विद्या को जानने वाला हो ॥ ३ ॥ इन सारे अद्भुत कार्य्यों की शान्ति करने एवं लोगों को बचाने वाले आङ्गिरस विद्या के विद्वान् ही हैं ॥४॥ राजा ने कहा इसकी तय्यारी करो ॥ ५ ॥ उसकी तय्यारी में कटोरा, अखण्ड नये वस्त्र, शुद्ध घृत, शान्ता ओषधी, नया जलकलश ॥६॥ इसके करने के तीन समय हैं । पौर्णमासी, अमावास्या और शुभ नक्षत्र ॥७॥ या आतुरता वश जब कभी चाहे तब ही करे ॥८॥ स्नान कर नये अखण्ड वस्त्र पहन कर सुगन्धित पदार्थों का सेवन, व्रतवान्, कर्मण्य, उपवास रहे एक रात्रि, ३ रात्रि, छः रात्रि, या १२ रात्रि ॥९॥ द्वादशी के प्रातःकाल जहाँ ही वह पड़े वहीं उत्तर अग्नि का आधान करके ॥१०॥ २९