कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । उत्तरमग्निमुपसमाधाय ॥१०॥ परिसमुह्य पर्युक्ष्य परि- स्तीर्य बर्हिरुदपात्रमुपसाद्य परिचरणेनाज्यं परिचर्य ॥११॥ नित्यान्पुरस्ताद्धोमान् हुत्वाज्यभागौ च ॥१२॥ अथ जुहोति ॥१३॥ घृतस्य धारा इह या वर्षन्ति पक्कं मांसं मधु च यद्धिरणयम् ॥ द्विषन्तमेता अनुयन्तु वृष्ट- योऽपां वृष्टयो बहुलाः सन्तु मह्यम् ॥ लोहितवर्षं मधु- पांसुवर्षं यद्वा वर्षं घोरमनिष्टमन्यत् ॥ द्विषन्तमेते अनुयन्तु सर्वे पराञ्चो यन्तु निवर्तमानाः ॥ अग्नये स्वाहेति हुत्वा ॥१४॥ दिव्यो गन्धर्व इति मातृनामभि- र्जुहुयात् ॥१५॥ वरमनड्वाहं ब्राह्मणः कर्त्रे दद्यात् ॥१६॥ सीरं वैश्योऽश्वं प्रादेशिको ग्रामवरं राजा ॥१७॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥१८॥२॥९४॥ अथ यत्रैतानि यक्षाणि दृश्यन्ते तद्यथैतन्मर्कटः श्वापदो वायसः पुरुषरूपमिति तदेवमाशङ्क्यमेव भव- ति ॥१॥ तत्र जुहुयात् ॥२॥ यन्मर्कटः श्वापदो वायसो यदीदं राष्ट्रं जातवेदः पताति पुरुषरक्षसमिषिरं यत्प- परिसमूहन, पर्युक्षण, परिस्तरण करके बर्हिः, एवं जलपात्र को लाकर परिचरण द्वारा आज्य की परिचर्या करके ॥११॥ नित्य पुरस्तात् होमों को करके और आज्यभाग की दो आहुतियाँ करके ॥१२॥ अब हवन करे “घृतस्य धारा इह०” इत्यादि से अग्नये स्वाहा से आहुति करके ॥१३॥१४॥ “दिव्यो गन्धर्व०” से मातृनामों से आहुतियाँ देवे । ब्राह्मण को दक्षिणा में बैल देवे ॥१५॥१६॥ वैश्य दक्षिणा में सीर देवे और प्रादेशिक हो तो दक्षिणा में घोड़ा देवे । एवं राजा अच्छा ग्राम दक्षिणा में देवे ॥१७॥ यही उसकी प्रायश्चित्ति है ॥१८॥२॥६४॥ यह चौरानवेवी कण्डिका खतम हुई ॥ जहाँ यक्षों को देखे—जैसे कि मर्कट, श्वांपद, वायस, पुरुष रूप तब ही आशङ्का होती है ॥१॥ तब वहाँ आहुति करे ॥२॥ “यन्मर्कटः