भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

पृष्ठ 259, कुल 361 में से

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पृष्ठ 259

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २२७ ताति । द्विषन्तमेते अनुयन्तु सर्वे पराञ्चो यन्तु निवर्त- मानाः॥ अग्नये स्वाहेति हुत्वा ॥३॥ दिव्यो गन्धर्व इति मातृनामभिर्जुहुयात् ॥४॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः॥५॥३॥९५॥ अथ ह गोमायू नाम मण्डूकौ यत्र वदतस्तद्यन्म- न्यन्ते मां प्रति वदतो मां प्रति वदत इति तदेवमा- शङ्क्यमेव भवति ॥१॥ तत्र जुहुयात् ॥२॥ यद् गोमायू वदतो जातवेदोऽन्यया वाचाभि जक्षभातः ॥ रथन्तरं बृहच्च सामैतद्विषन्तमेतावभि नानदैताम् ॥ रथन्तरेण त्वा बृहच्छमयामि बृहता त्वा रथन्तरं शमयामि ॥ इन्द्राग्नी त्वा ब्रह्मणा वावृधानावायुष्मन्तावुरुमं त्वा कराथः ॥ इन्द्राग्निभ्यां स्वाहेति हुत्वा ॥३॥ दिव्यो गन्धर्व इति मातृनामभिर्जुहुयात् ॥४॥ सा तत्र प्राय- श्चित्तिः ॥५॥४॥९६॥ अथ यत्रैतत्कुलं कलहि भवति तन्निर्ऋतिगृहीतमि- त्याचक्षते ॥१॥ तत्र जुहुयात् ॥२॥ आरादरातिमिति द्व

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