भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

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अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २२९ स्वाभिवस्ते । यथाग्निः पृथिवीमा विवेशैवायं ध्रुवो अच्युतो अस्तु जिष्णुः। यथा देवो दिवि स्तनयन्वि राजति यथा वर्षं वर्षकामाय वर्षति । यथापः पृथिवीमा विवि- शुरेवायं ध्रुवो अच्युतो अस्तु जिष्णुः॥ यथा पुरीषं नद्याः समुद्रमहोरात्रे अप्रमादं क्षरन्ति ॥ एवा विशः संमनसो हवं मेऽप्रमादमिहोपा यन्तु सर्वाः ॥ दृहंतां देवी सह देवताभिर्ध्रुवा दृढाच्युता मे अस्तु भूमिः। सर्वंपाप्मानम- पनुद्यास्मदमित्रान्मे द्विषतोऽनुविध्यतु ॥ पृथिव्यै स्वाहेति हुत्वा ॥२॥ आ त्वाहार्षं ध्रुवा द्यौः सत्यं बृहदित्येतेनानु- वाकेन जुहुयात् ॥३॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥४॥६॥९८॥ अथ यत्रैतदादित्यं तमो गृह्णाति तत्र जुहुयात् ॥१॥ दिव्यं चित्रमृत्वया कल्पयन्तमृतूनामुग्रं भ्रमयन्नु- देति । तदादित्यः प्रतरन्नेतु सर्वत आप इमां लोकाननु- संचरन्ति ॥ ओषधीभिः संविदानाविन्द्राग्नी त्वाभि- रक्षताम् ॥ ऋतेन सत्यवाकेन तेन सर्वं तमो जहि ॥ आदित्याय स्वाहेति हुत्वा ॥२॥ विपासहिं सहमानमि- त्येतेन सूक्तेन जुहुयात् ॥३॥ रोहितैरुपतिष्ठते ॥४॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥५॥७॥६६॥ इत्यादि से आहुति देकर ॥ २ ॥ “आ त्वाहार्षं ध्रुवा द्यौः०” इत्यादि अनुवाकसे आहुति देवे ॥ ३ ॥ यही उसकी प्रायश्चित्ति है ॥ ४ ॥ ६ ॥ ॥ ९८ ॥ यह अट्ठानवेवी कण्डिका खतम हुई ॥ जहां सूर्य ग्रहण होता है, वहां आहुति देवे ॥ १ ॥ “दिव्यं चित्र- मृतूया०” इत्यादिसे आहुति देकर ॥ २ ॥ “विषासहिं०” इत्यादि सूक्त से आहुति देवे ॥ ३ ॥ “रोहितैः” से उपस्थान करे ॥ ४ ॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥ ५ ॥ ७ ॥ ६६ ॥ यह निन्यानवेवी कण्डिका खतम हुई ॥