भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

पृष्ठ 265, कुल 361 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 265

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २३३ उपा गहि सहस्रापोषं सुभगे रराणा ॥ हिरण्यस्र- क्पुष्करिणी श्यामा सर्वाङ्गशोभनी ॥ कृषिर्हिरण्यप्रकारा प्रत्यष्टा श्रीरियं मयि ॥ अश्विभ्यां देवि सह संविदाना इन्द्रेण राधेन सह पुष्ट्या न आ गहि ॥ विशस्त्वा रासन्तां प्रदिशोऽनु सर्वा अहोरात्रार्धमासमासा आर्तवा ऋतुभिः सह ॥ भर्त्री देवानामुत मर्त्यानां भर्त्री प्रजा- नामुत मानुषाणाम् ॥ हस्तिभिरितरासैः क्षेत्रसारथि- भिः सह । हिरण्यैरश्वैरा गोभिः प्रत्यष्टा श्रीरियं मयि ॥७॥ अत्र शुनासीराण्यनुयोजयेत् ॥ ८ ॥ वरमनड्वा- हमिति समानम् ॥६॥१४॥१०६॥ अथ यत्रैतत्स्रजन्त्योर्वा कृन्तन्त्योर्वा नाना तन्तू संसृजतो मनायै तन्तुं प्रथममित्येतेन सूक्तेन जुहुयात् ॥१॥ मनायै तन्तुं प्रथमं पश्येदन्या अतन्वत । तन्नारीः प्रब्रवीमि वः साध्वीर्वः सन्तूर्वरीः ॥ साधुर्वस्तन्तुर्भवतु साधुरेतु रथो वृतः ॥ अथो होर्धरीर्यूयं प्रातर्वोढवे धावत ॥ खर्गला इव पह्वरीरपामुग्रमिवायनम् । पतन्तु पह्वरीरिचोर्वरीः साधुना पथा ॥ अवाच्यौ ते तोतुद्येते तोदेनाइवतराविव ॥ प्र स्तोममुर्वरीणां शशयानामस्ता- विषम् ॥ नारी पश्चमयूखं सूत्र॒वत्कृणुते वसु ॥ अरिष्टो अस्य वस्ता प्रेन्द्र वास उतोटिरे ॥२॥ वासः कर्त्रे दद्यात् रिणी०” इत्यादि से आहुति देवे ॥ ७ ॥ यहां शुनासीरों की अनुयोजना करे ॥ ८ ॥ कर्त्ता को दक्षिणा में बैल देवे ॥ ९ ॥ १४ ॥ १०६ ॥ यह एक- सौ छहवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहां सूतों के.कातने या बिनने में सूत परस्पर संसृज होकर टूट जावे या बेकाम हो जाया करे वहां आहुति करे ॥१॥ “मनायै तन्तुं प्रथमं०” इत्यादि से आहुति करे ॥ २ ॥ कर्त्ता को दक्षिणा में वस्त्र देवे ॥ ३ ॥ यह • ३०