भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

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२३४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ॥३॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥४॥१५॥१०७॥ अथ यत्रैतदग्निनाग्निः संसृज्यते भवतं नः समन- सौ समोकसावित्येतेन सूक्तेन जुहुयात् ॥ १ ॥ भवतं नः समनसौ समोकसावरेपसौ । मा हिंसिष्टं यज्ञपतिं मा यज्ञं जातवेदसौ शिवौ भवतमद्य नः ॥ अग्निनाग्निः संसृज्यते कविर्गृहपतिर्युवा । हव्यवाड् जुह्वास्यः ॥ त्वं ह्यग्ने अग्निना विप्रो विप्रेण सन्सता । सखा सख्या समिध्यसे ॥ पाहि नो अग्न एकया पाहि न उत द्वितीयया । पाहि गीर्भिस्तिसृभिरूर्जांपते पाहि चतसृभिर्वसो ॥ समीची माहनी पातामायुष्मत्या ऋचो मा सन्ति । तनूपाःसाम्नो वसुविदं लोकमनुसंचराणि ॥२॥ रुक्मं कर्त्रे दद्यात् ॥३॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥४॥१६॥१०८॥ अथ यत्रैतद्यमसूर्यमौ जनयति तां शान्त्युदकेना भ्युक्ष्य दोहयित्वा ॥ १ ॥ तस्या एव गोर्दुग्धे स्थालीपाकं श्रपयित्वा ॥२॥ प्राञ्चमिध्ममुपसमाधाय ॥३॥ परिसमुह्य पर्युक्ष्य परिस्तीर्य बर्हिरुदपात्रमुपसाद्य ॥ ४ ॥ एकैक- उसकी प्रायश्चित्ति है ॥४॥ १५ ॥ १०७ ॥ यह एक सौ सातवी कण्डिका समाप्त हुई ॥ अब जहां जहां अग्नि से अग्नि का संघर्ष हो जावे वहां "भवतं नः समनसौ समोकसौ" इस सूक्त से आहुति देवे ॥ १ ॥ "भवतं नः सम- नसौ०" इत्यादि से आहुति देवे ॥ २ ॥ कर्त्ता को दक्षिणा में सोना देवे ॥ ३ ॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥४॥१६॥१०८॥ यह एकसौ आठहवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहाँ एक साथ अनेक बच्चे गौ को पैदा हों उसको शान्ति जल से अभ्युक्षण कर गौ को दुह करके ॥१॥ उसी गौ के दूध में स्थाली- पाक पका कर ॥२॥ पूर्वाभिमुख इध्माधान करके ॥३॥ परिसमूहन, पर्युक्षण, परिस्तरण करके, बर्हिकुश एवं जलपात्र लाकर के ॥४॥ 'एकैकयै-