भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

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अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २३५ यैषा सृष्ट्या सं बभूवेत्येतेन सूक्तेनाज्यं जुहन् ॥ ५ ॥ उदपात्रे सम्पातानानयति ॥ ६ ॥ उत्तमं संपातमोदने प्रत्यनयति ।॥७॥ ततो गां च प्राशयति वत्सौ चोदपात्रा- देनानाचामयति च संप्रोक्षति च ॥ ८ ॥ तां तस्यैव दद्यात् ॥९॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥१०॥१७॥१०९॥ अथ चेद्वडवा वा गर्दभी वा स्यादेवमेव प्राञ्चमिध्म- मुपसमाधाय ॥ १ ॥ एवं परिस्तीर्य ॥२॥ एवमुपसाद्य ॥३॥ एतेनैव सूक्तेनाज्यं जुहन् ॥४॥ उदपात्रे संपाताना- नयति ॥५॥ उदपात्रादेनानाचामयति च संप्रोक्षति च ॥६॥ तां तस्यैव दद्यात् ॥७॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥८॥१८॥११०॥ अथ चेन्मानुषी स्यादेवमेव प्राञ्चमिध्ममुपसमाधाय ॥१॥ एवं परिस्तीर्य ॥२॥ एवमुपसाद्य ॥३॥ उपस्थे जातकावाधाय ॥४॥ एतेनैव सूक्तेनाज्यं जुहन् ॥५॥ षा सृष्ट्या०” इत्यादि सूक्त से आज्य की आहुति करता हुआ जलपात्र में सम्पातों को रखता जावे । उत्तम सम्पात को ओदन में लावे ॥५॥६॥७॥ तब गौ और दोनों बच्चों को प्राशन करावे और जलपात्र से इसको आचमन करा कर सम्प्रोक्षण करावे ॥८॥ उस गौ को कर्त्ता ही को देवे ॥९॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥१०॥१७॥१०९॥ यह एकसौ नौहवी कण्डिका खतम हुई ॥ यदि घोड़ी या गदही इसी प्रकार जोड़े बच्चे प्रसव करे तो पूर्वाभि- मुख इध्मों का आधान करके एवं परिस्तरण करके सामग्रियों को आसा- दन करके इसी सूक्त से आज्य की आहुति देता हुआ ॥१॥२॥३॥४॥ जलपात्र में सम्पातों को रखे ॥५॥ जलपात्र ही से इनको आचमन और सम्प्रोक्षण करे ॥६॥ इसको दक्षिणा में कर्त्ता को ही देवे ॥७॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥८॥१८॥११०॥ यह एकसौ दसवी कण्डिका खतम हुई ॥ यदि मनुष्यस्त्री को यमल प्रसव हो तो, उसको भी इसी प्रकार पूर्वा- भिमुख इध्मों का आधान, परिस्तरण और उपसादन करके ॥१॥२॥३॥