भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

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२३६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । अमीषां मूर्ध्नि स मातुः पुत्रयोरित्यनुपूर्वं सम्पाताना- नयति ॥६॥ उदपात्र उत्तरान्संपातान् ॥७॥ उदपात्रा- देनानाचामयति च संप्रोक्षति च ॥८॥ तां तस्यैव दद्यात् ॥६॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥१०॥ तस्या निष्क्रयो यथार्हं यथासंपद्वा ॥११॥१६॥१११॥ अथ यत्रैतद्धेनवो लोहितं दुह्रते यः पौरुषेयेण क्रविषा समङ्क्त इत्येताभिश्चतसृभिर्जुहुयात् ॥१॥ वरां धेनुं कर्त्रे दद्यात् ॥२॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥३॥२०॥११२॥ अथ यत्रैतदनड्वान्धेनुं धयति तत्र जुहुयात् ॥१॥ अनड्वान्धेनुमधयदिन्द्रो गोरूपमाविशत् । स मे भूतिं च पुष्टिं च दीर्घमायुश्च धेहि नः॥ इन्द्राय स्वाहेति हुत्वा ॥२॥ मा नो विदन्नमो देववधेभ्य इत्येताभ्यां सूक्ताभ्यां जुहुयात् ॥३॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥४॥२१॥११३॥ गोदमें बच्चों को लेकर इसी सूक्त से आज्य की आहुति देता हुआ। “अमीषां मूर्ध्नि०” इत्यादि से सम्पातों को लावे ॥४॥५॥६॥ जलपात्र में शेष सम्पातों को धरे ॥७॥ जलपात्र ही से इनको आचमन और सम्प्रो- क्षण करे ॥८॥ उसके बच्चों को उसीको देवे ॥६॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥१०॥ उसका निष्क्रय यथाशक्ति यथासम्पद् कर्त्ता को देवे ॥११॥ ॥१९॥१११॥ यह एक सौ ग्यारहवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहाँ धेनु को दुहने पर दूध की जगह रुधिर आवे तो “यः पौरु- षेयेण क्रविषा समङ्क्त०” इत्यादि ४ ऋचाओं से चार आहुतियाँ देवे ॥१॥ कर्त्ता को दक्षिणा में धेनु देवे ॥२॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥३॥ ॥२०॥११२॥ यह एकसौ बारहवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहाँ बैल धेनु पर मैथुनार्थ चेष्टा करता है, वहाँ आहुति करे ॥१॥ “अनड्वान्धेनुमधयदिन्द्रो०” इत्यादि से आहुति देकर ॥२॥ “मा नो विदन्नमो देववधेभ्यः०” इन दो सूक्तों से आहुति देवे ॥५॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥४॥२१॥११३॥ यह एकसौ तेरहवी कण्डिका खतम हुई ॥