कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
२३६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । अमीषां मूर्ध्नि स मातुः पुत्रयोरित्यनुपूर्वं सम्पाताना- नयति ॥६॥ उदपात्र उत्तरान्संपातान् ॥७॥ उदपात्रा- देनानाचामयति च संप्रोक्षति च ॥८॥ तां तस्यैव दद्यात् ॥६॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥१०॥ तस्या निष्क्रयो यथार्हं यथासंपद्वा ॥११॥१६॥१११॥ अथ यत्रैतद्धेनवो लोहितं दुह्रते यः पौरुषेयेण क्रविषा समङ्क्त इत्येताभिश्चतसृभिर्जुहुयात् ॥१॥ वरां धेनुं कर्त्रे दद्यात् ॥२॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥३॥२०॥११२॥ अथ यत्रैतदनड्वान्धेनुं धयति तत्र जुहुयात् ॥१॥ अनड्वान्धेनुमधयदिन्द्रो गोरूपमाविशत् । स मे भूतिं च पुष्टिं च दीर्घमायुश्च धेहि नः॥ इन्द्राय स्वाहेति हुत्वा ॥२॥ मा नो विदन्नमो देववधेभ्य इत्येताभ्यां सूक्ताभ्यां जुहुयात् ॥३॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥४॥२१॥११३॥ गोदमें बच्चों को लेकर इसी सूक्त से आज्य की आहुति देता हुआ। “अमीषां मूर्ध्नि०” इत्यादि से सम्पातों को लावे ॥४॥५॥६॥ जलपात्र में शेष सम्पातों को धरे ॥७॥ जलपात्र ही से इनको आचमन और सम्प्रो- क्षण करे ॥८॥ उसके बच्चों को उसीको देवे ॥६॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥१०॥ उसका निष्क्रय यथाशक्ति यथासम्पद् कर्त्ता को देवे ॥११॥ ॥१९॥१११॥ यह एक सौ ग्यारहवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहाँ धेनु को दुहने पर दूध की जगह रुधिर आवे तो “यः पौरु- षेयेण क्रविषा समङ्क्त०” इत्यादि ४ ऋचाओं से चार आहुतियाँ देवे ॥१॥ कर्त्ता को दक्षिणा में धेनु देवे ॥२॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥३॥ ॥२०॥११२॥ यह एकसौ बारहवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहाँ बैल धेनु पर मैथुनार्थ चेष्टा करता है, वहाँ आहुति करे ॥१॥ “अनड्वान्धेनुमधयदिन्द्रो०” इत्यादि से आहुति देकर ॥२॥ “मा नो विदन्नमो देववधेभ्यः०” इन दो सूक्तों से आहुति देवे ॥५॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥४॥२१॥११३॥ यह एकसौ तेरहवी कण्डिका खतम हुई ॥
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २३७ अथ यत्रैतद्धेनुर्धेनं धयति तत्र जुहुयात् ॥१॥ योगक्षेमं धेनुं वाजपत्नीमिन्द्राग्निभ्यां प्रेषिते जक्षभाने। तस्मान्मा- मग्ने परि पाहि घोरात्प्र नो जायन्तां मिथुनानि रूपशः॥ इन्द्राग्निभ्यां स्वाहेति हुत्वा ॥२॥ दिव्यो गन्धर्व इति मातृ- नामभिर्जुहुयात् ॥३॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥४।२२।११४॥ अथ यत्रैतद्गौर्वाश्वो वाश्वतरो वा पुरुषो वाका- शफेनमवगन्धयति तत्र जुहुयात् ॥१॥ पयो देवेषु पय ओषधीषु पय आशासु पयोऽन्तरिक्षे । तन्मे धाता च सविता च धत्तां विश्वे तद्देवा अभिसंगृणन्तु ॥ पयो यदप्सु पय उस्रियासु पय उत्सेषूत पर्वतेषु । तन्मे धाता च सविता च धत्तां विश्वे तद्देवा अभिसंगृणन्तु ॥ यन्मृगेषु पय आविष्ठमस्ति यदेजति पतति यत्पतत्रिषु । तन्मे धाता च सविता च धत्तां विश्वे तद्देवा अभि- संगृणन्तु ॥ यानि पयांसि दिव्यार्पितानि यान्यन्तरिक्षे बहुधा बहूनि । तेषामीशानं वशिनी नो अद्य प्रदत्ता द्यावापृथिवी अहृणीयमाना इत्येतेन सूक्तेन जुहुयात् ॥२॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥३।२३।११५॥ अथ यत्रैतत्पिपीलिका अनाचाररूपा दृश्यन्ते तत्र अब जहाँ धेनु धेनु से मैथुन करना चाहती है, वहाँ आहुति करे ॥१॥ “योगक्षेमं धेनुं०” इत्यादि से आहुति देकर ॥२॥ “दिव्यो गन्धर्व०” और मातृ नामों से आहुतियाँ देवे ॥२।३॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥४।२२।११४॥ यह एकसौ चौदहवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहाँ गौ या अश्व या अश्वतर या पुरुष आकाश के फेन का गन्ध लेता है, वहाँ आहुति करे ॥१॥ “पयो देवेषु०” इत्यादि इस सूक्त से आहुति करे ॥२॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥३।२३।११५॥ यह एकसौ पन्द्रहवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहाँ पिपीलिका अनाचार रूप से दीखने लगतीं, तहाँ आहुति
२३८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । जुहुयात् ॥ १ ॥ भुवाय स्वाहा भुवनाय स्वाहा भुवन- पतये स्वाहा भुवां पतये स्वाहा वोषाय स्वाहा विनताय स्वाहा शतारुणाय स्वाहा ॥२॥ यः प्राच्यां दिशि श्वेत- पिपीलिकानां राजा तस्मै स्वाहा। यो दक्षिणायां दिशि कृष्णपिपीलिकानां राजा तस्मै स्वाहा। यः प्रतीच्यां दिशि रजतपिपीलिकानां राजा तस्मै स्वाहा। य उदी- च्यां दिशि रोहितपिपीलिकानां राजा तस्मै स्वाहा। यो ध्रुवायां दिशि बभ्रुपिपीलिकानां राजा तस्मै स्वाहा। यो व्यध्वायां दिशि हरितपिपीलिकानां राजा तस्मै स्वाहा। य ऊर्ध्वायां दिश्यरुणपिपीलिकानां राजा तस्मै स्वाहा॥३॥ ताश्चेदेतावता न शाम्येयुस्तत उत्तरमग्निमुपसमा- धाय ॥ ४ ॥ शरमयं बर्हिरुभयतः परिच्छिन्नं प्रसव्यं परि- स्तीर्य ॥ ५ ॥ विषावध्वस्तमिङ्गिडमाज्यं शाकपलाशे- नोत्पूतं बाधकेन स्रुवेण जुहोति ॥६॥ उत्तिष्ठत निर्द्रवत न व इहास्त्वत्यश्वनम् । इन्द्रो वः सर्वासां साकं गर्भा- नाण्डानि भेत्स्यति । फडुताः पिपीलिका इति ॥ ७ ॥ इन्द्रो वो यमो वो वरुणो वोऽग्निर्वो वायुर्वः सूर्यो वश्चन्द्रो वः प्रजापतिर्व ईशानो व इति ॥८॥२४॥११६॥ अथ यत्रैतन्नीलमक्षा अनाचाररूपा दृश्यन्ते तत्र करे॥१॥ "भुवाय स्वाहा, भुवनाय स्वाहा०" इत्यादि से आहुति देवे ॥२॥ ॥३॥ यदि इससे न शान्ति करें तो उत्तर अग्नि का आधान करके ॥४॥ शरमयबर्हि जो दोनों ओर टूटे हों प्रसन्य परिस्तरण करके ॥५॥ विषा- वध्वस्त इङ्गिड आज्य को शाक के पत्ते से उत्पवन करके बाधक वृक्ष के स्रुव से आहुति देवे ॥६॥ "उत्तिष्ठत निर्द्रवत०" इत्यादि से ॥७॥ फिर "इन्द्रो वो यमो०" इत्यादि से आहुति देवे ॥८॥२४॥११६॥ यह एकसौ सोलहवी कण्डिका खतम हुई ॥
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २३९
जुहुयात् ॥१॥ या मर्त्यैः सरथं यान्ति घोरा मृत्योर्दूत्यः क्रविशः सं बभूवुः। शिवं चक्षुरुत घोषः शिवानां शं नो अस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे ॥ शान्तं चक्षुरुत वायसीनां या ह्यासां घोरा मनसो विसृष्टिः ॥ मनसस्पते तन्वा मा पाहि घोरान्मा वि रिक्षि तन्वा मा प्रजया मा पशु- भिर्घायवे स्वाहेति हुत्वा ॥२॥ वात आ वातु भेषजमित्ये- तेन सूक्तेन जुहुयात् ॥३॥ वात आ वातु भेषजं शंभु मयोभु नो हृदे ॥ प्र ण आयूंषि ता°र्षत् ॥ उत वात पितासि न उत भ्रातोत नः सखा । स नो जीवातवे कृधि ॥ यददो वात ते गृहे निहितं भेषजं गुहा । तस्य नो धेहि जीवस इत्येतेन सूक्तेन जुहुयात् ॥४॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥५॥२५॥११७॥ अथ यत्रैतन्मधुमक्षिका अनाचाररूपा दृश्यन्ते मधु वात ऋतायत इत्येतेन सूक्तेन जुहुयात् ॥१॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥२॥२६॥११८॥ अथ यत्रैतदनाज्ञातमद्भुतं दृश्यते तत्र जुहुयात् ॥१॥ यदज्ञातमनाज्ञातमर्थस्य कर्मणो मिथः॥ अग्ने त्वं नस्त- स्मात्पाहि स हि वेत्थ यथायथम् ॥ अग्नये स्वाहा ॥२॥ वायो सूर्य चन्द्रेति च ॥३॥ पुरुषसंमितोऽर्थः कर्मार्थः
अब जहाँ नीले रंग की मक्षिका अनाचार रूप से दीख पड़ें, वहाँ आहुति देवे ॥१॥ “या मर्त्यैः सरथं यान्ति०” इत्यादि से आहुति देवे ॥२॥ “वात आ वातु०” इत्यादि सूक्त से आहुति देवे ॥३॥ 'वात आ वातु भेषजं०” इत्यादि सूक्त से आहुति देवे ॥४॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥५॥२५॥११७॥ यह एकसौ सतरहवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहाँ मधुमक्षिका अनाचार रूपा दीख पड़े, वहाँ आहुति देना चाहिये ॥१॥ “यदज्ञातमनाम्नातं०” इत्यादि से आहुति देवे ॥२॥
पुरुषसंमितः । वायुर्मा तस्मात्पातु स हि वेत्थ यथा- यथम् ॥ वायवे स्वाहा ॥४॥ अग्निर्मा सूर्यो मा चन्द्रो मेति च ॥५॥२७॥११९॥ अथ यत्रैतद्ग्रामे वावसाने वाग्निशरणे वा सम- ज्यायां वावदीर्येत चतस्रो धेनव उपक्लृप्ता भवन्ति श्वेता कृष्णा रोहिणी सुरूपा चतुर्थी ॥१॥ तासामेत- द्वादशरात्रं संदुग्धं नवनीतं निदधाति ॥२॥ द्वादश्याः प्रातर्यत्रैवादीऽवदीर्णं भवति तत उत्तरमग्निमुपसमा- धाय ॥३॥ परिसमुह्य पर्युक्ष्य परिस्तीर्य बर्हिः श्वेताया आज्येन सन्त्रीय ॥४॥ अग्निर्भूम्यामिति तिसृभिरभि मन्त्र्यालभ्य ॥५॥ अथ जुहुयात् ॥६॥ तथा दक्षिणार्धे ॥७॥ तथा पश्चार्धे ॥८॥ उत्तरार्धे संस्थाप्य वास्तोष्पत्यै- र्जुहुयात् ॥९॥ अवदीर्णे संपातानानीय संस्थाप्य होमान् ॥१०॥ अवदीर्णं शान्त्युदकेन संप्रोक्ष्य ॥११॥ ता एव “वायो सूर्य चन्द्रेति च०” इत्यादि से आहुति देवे ॥३॥४॥ “अग्निर्मा सूर्यो मा चन्द्रो मा०” इत्यादि से आहुति देवे ॥५॥२७॥११९॥ यह एकसौ उन्नीसवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहाँ ग्राम में या दहन गृह में या अग्निशाला में, या समज्या में कोई काष्ठ आदि फट या टूट जावे तो उसकी शान्ति के लिये ४ धेनु की आवश्यकता होती है । एक श्वेता, दूसरी काली, तीसरी रोहिणी, चौथी सुरूपा ॥ इन चारों के दूध, नवनीत १२ रात्र तक ग्रहण करे और द्वादशी के प्रातःकाल जहाँ, दीवार या काष्ठादि फट गया हो उससे उत्तर अग्नि का आधान करे ॥१॥२॥ परिसमूहन, पर्युक्षण, परिस्तरण करके बर्हिकुश को श्वेत गौ के घी से चपोट कर ॥४॥ “अग्निर्भूम्यां०” इत्यादि तीन ऋचा से अभिमंत्रण कर भूमि को स्पर्श करे ॥२॥ तब आहुति देवे ॥६॥ उसी प्रकार अग्नि के दक्षिणार्ध भाग में तथा पश्चिमार्ध में और उत्त- रार्द्ध में संस्थापन करके “वास्तोष्पत्य” ऋचाओं से आहुतियाँ देवे ॥७॥ ॥८॥९॥अवदीर्ण स्थान सम्पातों को लाकर होम को संस्थापन करके ॥१०॥
ब्राह्मणो दद्यात् ॥१२॥ सीरं वैश्योऽश्वं प्रादेशिको ग्राम- वरं राजा ॥१३॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥१४॥२८॥१२०॥ अथ यत्रैतदनुदक उदकोन्मीलो भवति हिरण्यवर्णा इत्यपां सूक्तैर्जुहुयात् ॥ १ ॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥ २ ॥ ॥२९॥१२१॥ अथ यत्रैतत्तिलाः समतैला भवन्ति तत्र जुहुयात् ॥१॥ अनूनाय स्वाहा। अक्षिताय स्वाहा । अपरिमिताय स्वाहा । परिपूर्णाय स्वाहा ॥ २ ॥ स यं द्विष्यात्तस्या- शायां लोहितं ते प्रसिञ्चामीति दक्षिणामुखः प्रसिञ्चेत् ॥३॥३०॥१२२॥ अथ यत्रैतद्वपां वा हवींषि वा वयांसि द्विपद चतुष्पदं वाभिमृश्यावगच्छेयुर्ये अग्नयो नमो देववधेभ्य इत्येताभ्यां सूक्ताभ्यां जुहुयात् ॥१॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः॥२॥३१॥१२३॥ अवदीर्ण को शान्ति जल से संप्रोक्षण करके ॥११॥ उसीको ब्राह्मण को दे देवे ॥१२॥ दक्षिणा में कर्त्ता को वैश्य (यजमान) सीर देवे, प्रादेशिक घोड़ा देवे और राजा ग्राम देवे ॥१३॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥१४॥ ॥२८॥१२०॥ यह एकसौ बीसवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहाँ विना जल के स्थान जल हो तो “हिरण्यवर्णा०” इत्यादि जल सूक्तों से आहुतियाँ देवे ॥१॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥२॥२९॥ ॥१२१॥ यह एकसौ इक्कीसवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहाँ तिल के बराबर उससे तैल निकले वहाँ आहुति देवे ॥१॥ अनूनाय स्वाहा। अक्षिताय स्वाहा। अपरिमिताय स्वाहा। परिपूर्णाय स्वाहा। “स यं द्विष्यात्तस्याशायां लोहितं ते प्रसिञ्चामि” से दक्षिणमुख सिंचन करे ॥२॥३॥३०॥१२२॥ यह एकसौ बाइसवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहाँ वपा को हवियों को चिल्ह, कौवे आदि लेकर भाग जावें तो “अग्नयो नमो देववधेभ्यः” इन दो सूक्तों से आहुतियाँ देवे ॥१॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥२॥३१॥१२३॥ यह एकसौ तेइसवी कण्डिका खतम हुई ॥ ३१
२४२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । अथ यत्रैतत्कुमारस्य कुमार्या वा द्वावावर्तौ मूर्धन्यौ भवतः सव्यावृदेको देशावर्तस्तत्र जुहुयात् ॥१॥ त्वष्टा रूपाणि बहुधा विकुर्वञ्जनयन्प्रजा बहुधा विश्वरूपाः ॥ स मे करोत्वविपरीतमस्माननुपूर्वं कल्पयतामिहैव ॥ त्वष्ट्रे स्वाहा ॥२॥ अन्तर्गर्भेपु बहुधा सं तनोति जनय- न्प्रजा बहुधा विश्वरूपाः । स मे करोत्वविपरीतमस्मा- ननुपूर्वं कल्पयतामिहैव ॥ त्वष्ट्रे स्वाहा ॥३॥ यद्यन्मृष्टं यदि वाभिमृष्टं तिरश्चीनर्थ उत ममृ॑जन्ते । शिवं तद्देवः सविता कृणोतु प्रजापतिः प्रजाभिः संविदानः ॥ त्वष्ट्रे स्वाहा ॥४॥ सव्यावृत्तान्युत या विश्वरूपा प्रत्यग्वृत्ता- न्युत या ते परुःषु ॥ तान्यस्य देव बहुधा बहूनि स्योनानि शग्मानि शिवानि सन्तु ॥
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २४३ यत्र लोकस्तत्रेमं यज्ञं यजमानं च घेहि ॥ वनस्पतये स्वाहेति हुत्वा ॥२॥ वनस्पतिः सह देवैर्न आगन्निति जुहुयात् ॥३॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥४॥३३॥१२५॥ अथ यत्रैतद्दिवोल्का पतति तद्योगक्षेमाशङ्कं भवत्यवृष्ट्याशङ्कं वा ॥१॥ तत्र राजा भूमिपतिर्विद्वांसं ब्रह्माणं वृणीयात् ॥२॥ स वृतोऽरण्यस्यार्धमभिव्रज्य तत्र द्वादशरात्रमनुशुष्येत् ॥३॥ स खलु पूर्वं नवरात्रमार- ण्यशाकमूलफलभक्षश्चाथोत्तरं त्रिरात्रं नान्यदुदकात् ॥ ॥ ४ ॥ श्वो भूते सप्तधेनव उपकॢप्ता भवन्ति श्वेता कृष्णा रोहिणी नीली पाटला सुरूपा बहुरूपा सप्तमी ॥ ५ ॥ तासामेतद्द्वादशरात्रं सन्दुग्धं नवनीतं निदधाति ॥६॥ द्वादश्याः प्रातर्यत्रैवासौ पतिता भवति तत उत्तर- मग्निमुपसमाधाय ॥७॥ परिसमुह्य पर्युँक्ष्य परिस्तीर्य बर्हिः ॥८॥ अथामुं नवनीतं सौवर्णे पात्रे विलाप्य सौव- ऽच्छतशाखो०” इत्यादि से आहुति करके ॥२॥ “वनस्पतिः सह देवैर्न०” से आहुति करे ॥३॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥४॥३३॥१२५॥ यह एकसौ पचीसवी कण्डिका खतम हुई । अब जहां दिन में उल्कापात होवे, वहां योग क्षेम होने में शङ्का है या अवृष्टि की शङ्का होगी ॥१॥ वहां राजा या भूमिपति विद्वान् ब्राह्मण को बुलाकर वरण करे ॥२॥ वह वृत हो वन के आध भाग में जाकर वहां १२ रात तपस्या करे ॥३॥ वह पहिले नौ रात वन्य शाक, फल, मूल खाकर निर्वाह करे और अन्तिम तीन रात फलादि भी न खावे, केवल जल पीकर रहे ॥४॥ प्रातः काल होते ही सात धेनु एकत्र करे । सफेद, काली, रोहिणी, नीली, पाटला, सुरूपा, बहुरूपा सप्तमी ॥५॥ उनका दूध एवं नवनीत १२ रात लेकर रखे ॥६॥ द्वादशी के प्रातःकाल में जहां, उल्का का पतन होता है उससे उत्तर में अग्न्याधान करके परिसमूहन, पर्युक्षण, परिस्तरण करके और बर्हि लाकर धरे ॥८॥
४. अध्याय ११-१४: राजकर्माणि, संग्राम-विजय, अन्त्येष्टि, श्राद्ध एवं ग्रन्थ उपसंहार
२४४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । र्णेन स्रुवेण रक्षोघ्नैश्च सूक्तैर्यामाहुस्तारकैषा विकेशी- त्येतेन सूक्तेनाज्यं जुह्वन् ॥ ९ ॥ अवपतिते सम्पाताना- नीय संस्थाप्य होमान् ॥ १० ॥ अवपतितं शान्त्युदकेन सम्प्रोक्ष्य ॥११॥ ता एव ब्राह्मणो दद्यात् ॥१२॥ सीरं वैश्योऽश्वं प्रादेशिको ग्रामवरं राजा ॥१३॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥१४॥३४॥१२६॥ अथ यत्रैतद्धूमकेतुः सप्तर्षीनुपधूपयति तद्योगक्षे- माशङ्कमित्युक्तम् ॥१॥ पञ्च पशवस्तायन्ते वारुणः कृष्णो गौर्वाजो वाविर्वा हरिर्वायव्यो बहुरूपो दिश्यो मारुती मेष्याग्नेयः प्राजापत्यश्च क्षीरौदनोऽपां नप्त्र उद्रः ॥२॥ उतेयं भूमिरिति त्रिर्वरुणमभिष्टूय ॥३॥ अप्सु ते राजन्नि- ति चतसृभिर्वारुणस्य जुहुयात् ॥४॥ वायवा रुन्द्धि नो मृगानस्मभ्यं मृगयद्वशः। स नो नेदिष्ठमा कृधि वातो हि रशनाकृत इति वायव्यस्य ॥५॥ आशानामिति दिश्य- अब उस नवनीत को सोने के पात्र में गलाकर धरे ॥ और सोने के स्रुवा से रक्षोघ्न सूक्तों से “यामाहुस्तारकैषा विकेशी” इस सूक्त से आज्य की आहुती देता हुआ । गिरे हुए संपातों को लाकर और होम को संस्थापन करके ॥९॥१०॥ नीचे गिरे हुए सम्पात को शांति जल से संप्रोक्षण करके ब्राह्मण को देवे ॥११॥१२॥ सीर को वैश्य देवे, घोड़े को प्रादेशिक देवे और राजा ब्राह्मण को ग्राम देवे ॥१३॥ यह उसकी प्राय- श्चित्ति है ॥१४॥३४॥१२६॥ यह एकसौ छब्बीसवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहां धूमकेतु अपने प्रकाश से सप्तर्षि ताराओं को तपाता है, वहां कल्याण होने में शङ्का है । अत एव वहां पांच वारुण पशुओं को जो काली गौ या बकरा या भेड़, हरि, वायव्य, बहुरूप, दिश्य, मारुती, मेषी, आग्नेय और प्राजापत्य ॥ “क्षीरौदनोऽपां नप्त्र उद्रः” ॥२॥ “उतेयं भूमिः” इत्यादि तीन ऋ० से वरुण देव की स्तुति करके ॥३॥ “अप्सु ते राजन्०” इत्यादि ४ ऋ० से आहुती देवे ॥४॥ “वायवा रुन्धि०”
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २४५ स्य ॥६॥ प्रति त्यं चारुमध्वरं गोपीथाय प्रहूयसे । मरु- द्भिरग्न आ गहीति मारुतस्य ॥७॥ अपामग्निरित्याग्नेयस्य ॥८॥ प्रजापतिः सलिलादिति प्राजापत्यस्य । अपां सूक्तै- र्हिरण्यशकलेन सहोद्रमप्सु प्रवेशयेत् ॥१०॥ प्र हैव वर्षति ॥११॥ सर्वस्वं तत्र दक्षिणा ॥१२॥ तस्य निष्क्रयो यथार्हं यथासम्पद्वा ॥१३॥३५॥१२७॥ अथ यत्रैतन्नक्षत्राणि पतापतानीव भवन्ति तत्र जुहुयात् ॥१॥ यन्नक्षत्रं पतति जातवेदः सोमेन राज्ञेभिरं पुरस्तात् । तस्मान्मामग्ने परिपाहि घोरात्प्र णो जायन्तां मिथुनानि रूपशः ॥ इन्द्राग्निभ्यां स्वाहेति हुत्वा ॥२॥ सोमो राजा सविता च राजेत्येतेन सूक्तेन जुहुयात् ॥३॥ सोमो राजा सविता च राजा भुवो राजा भुवनं च राजा । शर्वो राजा शर्म च राजा त उ नः शर्म यच्छन्तु देवाः ॥ आदित्यैर्नो बृहस्पतिर्भगः सोमेन नः सह । विश्वे- देवा उर्वन्तरिक्षं त उ नः शर्म यच्छन्तु देवाः । उता- विद्वाग्निकृद्याथोस्त्रघ्नी यथायथम् । मा नो विश्वेदेवा इत्यादि से वायव्य की आहुति करे ॥५॥ "आशानां०" से दिश्य देवता की आहुति करे ॥६॥ "प्रति त्यं०" इत्यादि से मारुत की आहुति देवे ॥७॥ "अपामग्निः" इत्यादि से आग्नेय आहुति देवे ॥८॥ "सलिलात्" से प्राजापात्य आहुति देवे ॥९॥ जल सूक्तों से सोने के टुकड़े से उद्र के सहित को जल में प्रवेश करावे ॥१०॥ अवश्य ही वृष्टि होगी ॥११॥ इसकी दक्षिणा सर्वस्व देवे ॥१२॥ या उसका निष्क्रय यथाशक्ति या यथासम्पत् देवे ॥१३॥३५॥१२७॥ यह एकसौ सत्ताइसवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहां नक्षत्र गण गिरते या टूट कर गिरते से जान पड़ें, वहां आहुति करे ॥१॥ "यन्नक्षत्रं पतति०" इत्यादि से आहुति करके ॥२॥ "सोमो राजा०" इत्यादि सूक्त से आहुति देवे ॥३॥४॥ कर्त्ता को दक्षिणा
२४६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । मरुतो हेतिमिच्छत ॥४॥ रुक्मं कर्त्रे दद्यात् ॥५॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥६॥३६॥१२८॥ अथ यत्रैतन्मांसमुखो निपतति तत्र जुहुयात् ॥१॥ घोरो वज्रो देवसृष्टो न आगन्यद्वा गृहान्घोरमुता जगाम। तन्निर्जगाम हविषा घृतेन शं नो अस्तु द्विपदे शं चतु- ष्पदे ॥ रुद्राय स्वाहेति हुत्वा ॥२॥ भवाशर्वौ मृडतं मा- भियातमित्येतेन सूक्तेन जुहुयात् ॥३॥ सा तत्र प्राय- श्चित्तिः ॥४॥३७॥१२९॥ अथ यत्रैतदनग्नाववभासो भवति तत्र जुहुयात् ॥१॥ या तेऽवदीसिरवरूपा जातवेदोऽपेतो रक्षांसं भाग एषः। रक्षांसि तया दह जावेदो या नः प्रजां मनुष्यां सं सृजन्ते ॥ अग्नये स्वाहेति हुत्वा ॥२॥ अग्नी रक्षांसि सेधतीति प्रायश्चित्तिः ॥३॥३८॥१३०॥ अथ यत्रैतदग्निः श्वसतीव तत्र जुहुयात् ॥१॥ श्वेता कृष्णा रोहिणी जातवेदो यास्ते तनूस्तिरश्चीना निर्दहन्तीः श्वसन्तीः। रक्षांसि ताभिर्दह जातवेदो या सोना देवे ॥५॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥६॥३६॥१२८॥ यह एकसौ अट्ठाइसवी कण्डिका खतम हुई । अब जहां मांस सम्मुख गिरता हो, तहां आहुति करे ॥१॥ “घोरो वज्रो०” इत्यादि से आहुति करे ॥२॥ “भवा शर्वौ०” इत्यादि सूक्त से आहुति करे ॥३॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥४॥३७॥१२९॥ यह एकसौ उन्तीसवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहां विना आग के स्थान में आग का आभास हो, तहां आ- हुति करे ॥१॥ “या तेऽवदीप्ति०” इत्यादि से आहुति देवे ॥२॥ “अग्नी रक्षांसि सेधति०” इत्यादि से आहुति करे यही उसकी प्रायश्चित्ति है ॥३॥३८॥१३०॥ यह एकसौ तीसवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहां अग्नि सांस लेती प्रतीत होवे, तहां आहुति करे ॥१॥ “श्वेता
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २४७ नः प्रजां मनुष्यां संसृजन्ते ॥ अग्नये स्वाहेति हुत्वा ॥२॥ अग्नी रक्षांसि सेधतीति प्रायश्चित्तिः ॥३॥३६॥१३१॥ अथ यत्रैतत्सर्पिर्वा तैलं वा मधु वा विष्यन्दति यद्यामं चक्रुर्निखनन्त इत्येतेन सूक्तेन जुहुयात् ॥१॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥२॥४०॥१३२॥ अथ यत्रैतद्ग्राम्योऽग्निः शालां दहत्यपमित्य- मप्रतीत्तमित्येतैस्त्रिभिः सूक्तैर्मैश्रधान्यस्य पूर्णाञ्जलिं हुत्वा ॥१॥ ममोभा मित्रावरुणा मह्यमापो मधुमदेरयन्ता- मित्येताभ्यां सूक्ताभ्यां जुहुयात् ॥२॥ ममोभा मित्राव- रुणा ममोभेन्द्राबृहस्पती । मम त्वष्टा च पूषा च ममैव सविता वशे ॥ मम विष्णुश्च सोमश्च ममैव मरुतो भवन् । सरस्वांश्च भगश्च विश्वेदेवा वशे मम ॥ ममो- भा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं स्वर्मम । ममेमाः सर्वा ओषधीरापः सर्वा वशे मम ॥ मम गावो ममाश्वा ममा- जाश्वावयश्च ममैव पुरुषा भवन् । ममेदं सर्वमात्मन्वदे- जत्प्राणद्वशे ममेति ॥३॥ अरणी प्रताप्य स्थण्डिलं परि- कृष्णा०” इत्यादि आहुति करके ॥२॥ “अग्नी रक्षांसि०” से आहुति करे यही उसकी प्रायश्चित्ति है ॥३॥३९॥१३१॥ यह एकसौ एकतीसवी कण्डिका खतम हुई । अब जहां घी, या तेल या मधु विष्यन्द करे तो “यद्यामं चक्रुर्निख- नन्त०” इत्यादि सूक्त से आहुति करे ॥१॥ यही उसकी प्रायश्चित्ति है ॥ ॥२॥४०॥१३२॥ यह एकसौ बत्तीसवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहां ग्राम्य अग्नि अग्निशालाको दहन कर देवे । तहां “अप- मित्यमप्रतीत्तं०” इत्यादि तीन सूक्तों से मैश्रधान्य की पूर्णाञ्जलि आहुति करके ॥१॥ “ममोभा मित्रावरुणा०” इत्यादि दो सूक्तों से आहुति देवे ॥ ॥२॥ “ममोभा मित्रा०” इत्यादि से ॥३॥ अरणी को तपा करके वेदि
२४८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
मृज्य ॥४॥ अथाग्निं जनयेत् ॥५॥ इत एव प्रथमं जज्ञे अग्निराभ्यो योनिभ्यो अधि जातवेदाः ॥ स गायत्र्या त्रिष्टुभा जगत्यानुष्टुभा देवो देवेभ्यो हव्यं वहतु प्रजानन्निति जनयित्वा ॥ ६ ॥ भवतं नः समनसौ समोकसाविह्येतेन सूक्तेन जुहुयात् ॥ ७ ॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥८॥४१॥१३३॥ अथचेदागन्तुर्दहत्येवमेव कुर्यात् ॥१॥ सा तत्र प्रा- यश्चित्तिः ॥२॥४२॥१३४॥ अथ यत्रैतद्वंशः स्फोटति कपालेऽङ्गारा भवन्त्युदपात्रं बर्हिराज्यं तदादाय ॥१॥ शालायाः पृष्ठमुपसर्पति ॥२॥ तत्राङ्गारान्वा कपालं वोपनिदधात्या सन्तपनात् ॥ ३ ॥ प्राञ्चमिध्ममुपसमाधाय ॥४॥ परिसमूह्य पर्युक्ष्य परिस्तीर्य बर्हिरुदपात्रमुपसाद्य ॥५॥ परिचरणेनाज्यं परिचर्य ॥६॥ नित्यान्पुरस्ताद्धोमान्हुत्वाज्यभागौ च ॥७॥ अथ जुहोति
को मार्जन करके ॥४॥ अग्नि को उत्पादन करे ॥५॥ “इत एव प्रथमं०” इत्यादि मंत्रों से अग्नि उत्पादन करके “भवतं नः०” इत्यादि सूक्त से आहुति देवे ॥७॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥८॥४१॥१३३॥ यह एकसौ तैतीसवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहां कोई आगन्तुक आकर आग लगा देवे तो ऐसा ही करे ॥१॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥२॥४२॥१३४॥ यह एकसौ चौंतीसवी कण्डिका खतम हुई । अब जहां बांस स्फोट करे और कपाल में अङ्गारें हों । तो वहां जलपात्र को लाकर ॥१॥ शाला के पीठपर अङ्गारों या कपाल को आधान करे जब तक संतपन हो ॥२॥३॥ पूर्व भाग में इध्मों का आधान करके ॥४॥ परिसमूहन, पर्युक्षण, परिस्तरण करके बर्हिकुशों को लाकर ॥५॥ परिचरण करके आज्य तैयार करके ॥६॥ नित्य पुरस्तात् होमों को और आज्यभाग के दो होमों को करके ॥७॥ अब आहुति करे ॥८॥
॥८॥ असौ वै नाम ते माताऽसौ वै नाम ते पिता । असौ वै नाम ते दूतः स्ववंशमधितिष्ठति ॥ उत्तमरात्री णाम मृत्यो ते माता तस्य ते अन्तकः पिता। समं दधानस्ते दूतः स्ववंशमधितिष्ठति ॥ बहवोऽस्य पाशा वितताः पृथि- व्यामसंख्येया अपर्यन्ता अनन्ताः । याभिर्वेशानभिनिद्- धाति प्राणिनां यान्कांश्चेमान्प्राणभृतां जिघांसन् । स इमं दूतं नुदतु वंशपृष्ठात्स मे गच्छतु द्विषतो निवेशं मृत्यवे स्वाहा ॥ बृहस्पतिराङ्गिरसो ब्रह्मणः पुत्रो विश्वे- देवाः प्रददुर्विश्वमेजत् । स इमं दूतं नुदतु वंशपृष्ठात्स मे गच्छतु द्विषतो निवेशं बृहस्पतय आङ्गिरसाय स्वाहा ॥ यस्य तेऽन्नं न क्षीयते भूय एवोपजायते । यस्मै भूतं च भव्यं च सर्वमेतत्प्रतिष्ठितम् । स इमं दूतं नुदतु वंश- पृष्ठात्स मे गच्छतु द्विषतो निवेशमिन्द्राय स्वाहा ॥ मुखं देवानामिह यो बभूव यो जानाति वयुनानां समीपे । यस्मै हुतं देवता भक्षयन्ति वायुनेत्रः सुप्रणीतः सुनीतिः । स इमं दूतं नुदतु वंशपृष्ठात्स मे गच्छतु द्विषतो निवेशमग्नये स्वाहा ॥ यः पृथिव्यां च्यावयन्नेति वृक्षान् प्रभञ्जनेन रथेन सह संविदानः । रसान् गन्धान् भावयन्नेति देवो मातरिश्वा भूतभव्यस्य कर्त्ता । स इमं दूतं नुदतु वंशपृष्ठात्स मे गच्छतु द्विषतो निवेशं वायवे स्वाहा। ब्रह्मचारी चरति ब्रह्मचर्यमृचं गाथां ब्रह्म परं जिगांसन् । तं विघ्ना अनुपरियन्ति सर्वे ये अन्तरिक्षे
“असौ वै नाम ते माता” इत्यादिसे आहुति करे ॥ एवं “बृहस्पतिराङ्गि- रसो०” इत्यादि से आहुति करे ॥ “यस्य तेऽन्नंन०” इत्यादि से आ- हुति करे ॥ “मुखं देवानां०” इत्यादिसे । “यः पृथिव्यां०” इत्यादि से ॥ ३२
२५० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ये च दिवि श्रितासः । तं विशो अनुपरियन्ति सर्वाः कर्माणि लोके पहिमोहयन्ति । स इमं दूतं नुदतु वंश- पृष्ठात्स मे गच्छतु द्विषतो निवेशमादित्याय स्वाहा ॥ यो नक्षत्रैः सरथं याति देवः संसिद्धेन रथेन सह संवि- दानः। रूपं रूपं कृण्वानश्चित्रभानुः सुभानुः। स इमं दूतं नुदतु वंशपृष्ठात्स मे गच्छतु द्विषतो निवेशं चन्द्राय स्वाहा॥ ओषधयः सोमराज्ञीर्यशस्विनीः। ता इमं दूतं नुद- न्तु वंशपृष्ठात्स मे गच्छतु द्विषतो निवेशमोषधीभ्यः सो- मराज्ञीभ्यः स्वाहा॥ ओषधयो वरुणराज्ञीर्यशस्विनीः। ता इमं दूतं नुदन्तु वंशपृष्ठात्स मे गच्छतु द्विषतो निवेश- मोषधीभ्यो वरुणराज्ञीभ्यः स्वाहा॥ अष्टस्थूणो दशपक्षो यदृच्छजो वनस्पते । पुत्रांश्चैव पशूंश्चाभिरक्ष वनस्पते ॥ यो वनस्पतीनामुपतापो बभूव यद्वा गृहान्घोरमुताजगाम तन्निर्जगाम हविषा घृतेन शं नो अस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे ॥ यो वनस्पतीनामुपतापो न आगद्यद्वा यज्ञं नो अद्भुत- माजगाम। सर्वं तदग्ने हुतमस्तु भागशः शिवान्वयमुत्तरे- माभिवाजान् । त्वष्ट्रे स्वाहेति हुत्वा ॥९॥ त्वष्टा मे दैव्यं वच इत्यत्रोदपात्रं निनयति ॥१०॥ कपालेऽग्निं चादायो- पसर्पति ॥११॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥१२॥४३॥१३५॥ अथ यत्रैतत्कुम्भोद्धानः सक्तुधानी वोखा वानि- “ब्रह्मचारी चरति०” इत्यादि से ॥ “यो नक्षत्रैः सरथं०” इत्यादि से ॥ “ओषधयः सोमराज्ञी०” इत्यादि से ॥ “ओषधयो०” इत्यादि से ॥ “अष्टस्थूणो०” इत्यादि से ॥ आहुतियां करे ॥९॥ “त्वष्टा मे दैव्यं वचः” से जलपात्र को लावे ॥१०॥ और कपाल में अग्नि को लाकर उपसर्पण करे ॥११॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥१२॥४३॥१३५॥ यह एकसौ पैतीसवी कण्डिका खतम हुई ॥
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २५१ ङ्गिता विकसति तत्र जुहुयात् ॥१॥ भूमिर्भूमिमवागा- न्माता मातरमप्यगात्। ऋध्यास्म पुत्रैः पशुभिर्यो नो द्वेष्टि स भिद्यतामिति ॥२॥ सदसि सन्मे भूयादिति सक्तू- नावपेत् ॥३॥ अथ चेदोदनस्यानमस्यन्नं मे देह्यन्नं मा मा हिंसीरिति त्रिः प्राश्य ॥४॥ अथ यथाकामं प्राश्नीयात् ॥५॥ अथ चेदुद्दधानः स्यात्समुद्रं वः प्रहिणोमीत्येताभ्या- मभिमन्त्र्य ॥६॥ अन्यं कृत्वा ध्रुवाभ्यां दृंहयित्वा ॥७॥ तत्र हिरण्यवर्णा इत्युदकमासेचयेत् ॥८॥ स खल्वेतेषु कर्मसु सर्वत्र शान्त्युदकं कृत्वा सर्वत्र चातनान्यनुयोजये- न्मातृनामानि च ॥९॥ सर्वत्र वरां धेनुं कर्त्रे दद्यात् ॥१०॥ सर्वत्र कंसवसनं गौर्दक्षिणा ॥११॥ ब्राह्मणान् भक्तेनो- पेप्सन्ति ॥१२॥ यथोद्दिष्टं चादिष्टेष्विति प्रायश्चित्तिः प्रायश्चित्तिः ॥१३॥४४॥१३६॥ इत्यथर्ववेदे कौशिकसूत्रे त्रयोदशोऽध्यायः समाप्तः ॥१३॥ अब जहां यज्ञ स्थान में कुम्भोद्धान, सक्तुधानी या उखा या अनिङ्गिता विकसित हो वहां आहुति करे ॥१॥ “भूमिर्भूमि०” इत्यादि से सक्तु को वपन करे (डाले) ॥२॥३॥ “अथ चेदोदनस्यानं०” इत्यादि से तीन वार प्राशन करके ॥४॥ फिर यथेच्छ प्राशन करे ॥५॥ “अथ चेदुद्दधानः स्यात्०” इत्यादि दो ऋचाओं से अभिमंत्रण करके ॥६॥ दूसरे को बनाकर ध्रुवों से दृंहण करके ॥७॥ “हिरण्यवर्णा०” से जल का सेक करे ॥८॥ यह इन कर्मों में सर्वत्र शान्ति जल का प्रयोग करके सर्वत्र चातनों का अनुयोजन करे और मातृनामों को भी ॥९॥ सबही स्थान में सब लोग श्रेष्ठ धेनु कर्त्ता को देवें ॥१०॥ सर्वत्र कटोरा, कपड़ा, और गौ दक्षिणा देवे ॥११॥ ब्राह्मणों को ओदन भोजन करावें ॥१२॥ जैसा कहा गया वैसा या बिन कहे कर्मों के लिये यह प्रायश्चित्ति है ॥१३॥४४॥१३६॥ यह एक सौ छत्तीसवी कण्डिका समाप्त हुई ॥ यह अथर्ववेद के कौशिकसूत्र का तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥१३॥
२५२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । यथावितानं यज्ञवास्त्वध्यवसेत् ॥१॥ वेदिर्यज्ञस्या- ग्नेरुत्तरवेदिः॥२॥ उभे प्रागायते किञ्चित्प्रथीयस्यौ पश्चादु- द्यततरे ॥३॥ अपृथुसंमितां वेदिं विदध्यात् ॥४॥ षट्शमीं प्रागायतां चतुःशमीं श्रोण्याम् ॥५॥ त्रीन् मध्ये अधच- तुर्थानग्रतः ॥६॥ त्रयाणां पुरस्तादुत्तरवेदिं विदध्यात् ॥७॥ द्विशमीं प्रागायतामृज्वीमध्यर्धशमीं श्रोण्याम् ॥८॥ ग्रीष्मस्ते भूम इत्युपस्थाय ॥९॥ विमिमीष्व पयस्वतीमिति मिमानमनुमन्त्रयते ॥१०॥ बृहस्पते परिगृहाण वेदिं सुगा वो देवाः सदनानि सन्तु । अस्यां बर्हिः प्रथतां साध्वन्तर- हिंस्रा णः पृथिवी देव्यस्त्विति परिगृह्णाति ॥११॥ यत्ते भूम इति विखनति ॥१२॥ यत्त ऊनमिति संवपति ॥१३॥ त्वमस्यावपनी जनानामिति ततः पांसूनान्यतोदाहार्य ॥१४॥ बृहस्पते परिगृहाण वेदिमित्युत्तरवेदिमोप्यमानां परि- गृह्णाति ॥१५॥ असम्बाधं बध्यतो मानवानामिति प्रथ- यज्ञ के अनुसार (बड़े, छोटे आदि) यज्ञ गृह बनावे ॥१॥ अग्नि के उत्तर यज्ञवेदि बनावे। दोनों पूर्व-पश्चिम चौड़ा एवं कुछ मोटे हों उत्तर- दक्षिण लम्बी हो ॥ २ ॥ ३ ॥ अपृथु सम्मित वेदि बनावे ॥४॥ छः शमी पूर्वायत हों और चार शमी को श्रोणी में धरे ॥५॥ तीन को मध्य में, साढ़े चार शमी को आगे में ॥ ६ ॥ तीनों के पूर्व उत्तर वेदिको बनावे ॥ ७ ॥ दो शमी को पूर्वायता ऋज्वी हों और चौथाई शमी श्रोणी पर धरे ॥८॥ “ग्रीष्मस्ते भूम०” से उपस्थान करके ॥९॥ “विमिमीष्व पयस्वतीं०” से नापनेवाले को अनुमंत्रण करे ॥१०॥ “बृहस्पते परिगृहाण०” इत्यादि से परिग्रहण करे ॥११॥ “यत्ते भूम०” से भूमि को खनन करे ॥१२॥ “यत्त ऊनं०” से भर देवे ॥१३॥ “त्वमस्यावपनी०” इत्यादि से दूसरी जगह से धूलि को लाकरके ॥१४॥ “बृहस्पते परिगृहाण वेदिं०” इत्यादि से वेदि को भरते हुए को परिग्रहण करे ॥१५॥ “असंबाधं बध्यतो मान- बानां०” से वेदि को पूर्व को ढालुआ बनावे और बालु को उस पर
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २५३ यति ॥१६॥ यस्याश्चतस्रः प्रदिशः पृथिव्या इति चतुरस्रां करोति ॥१७॥ देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यामादद इति लेखनमादाय यत्राग्निं निधा- स्यन्भवति तत्र लक्षणं करोति ॥१८॥ इन्द्रः सीतां निगृह्णात्विति दक्षिणत आरभ्योत्तरत आलिखति॥१९॥ प्राचीमावृत्य दक्षिणतः प्राचीम् ॥२०॥ अपरास्तिस्रो मध्ये ॥२१॥ तस्यां व्रीहियवावोष्य ॥२२॥ वर्षेण भूमिः पृथिवी वृतावृतेत्यद्भिः सम्प्रोक्ष्य ॥२३॥ यस्यामन्नं व्रीहि- यवाविति भूमिं नमस्कृत्य ॥२४॥ अथाग्निं प्रणयेत् । त्वामग्ने भृगवो नयन्तामङ्गिरसः सदनं श्रेय एहि । विश्वकर्मा पुर एतु प्रजानन्धिष्ण्यं पन्थामनु ते दिशा- मेति ॥२५॥ भद्रश्रेयःस्वस्त्या वा ॥२६॥ अग्ने प्रेहीति वा॥२७॥ विश्वम्भरा वसुधानी प्रतिष्ठेति लक्षणे प्रतिष्ठाप्य ॥२८॥ अथेध्ममुपसमादधाति ॥२९॥ अग्निर्भूम्यामोषधी- ष्वग्निर्दिव आ तपत्यग्निवासाः पृथिव्यसितजूरेतमिध्मं बिछावे ॥१६॥ “यस्याश्चतस्रः प्रदिशः पृथिव्या” इत्यादि से चौकोन वेदि बनावे ॥१७॥ “देवस्य त्वा०” इत्यादि से लेखन को लेकर, जहाँ अग्नि का आधान करना होगा, वहाँ रेखायें खैंचे ॥१८॥ “इन्द्रः सीतां निगृह्णातु०” से दक्षिण से आरम्भ कर उत्तर तक रेखा करे ॥१९॥ पूर्व से लेकर दक्षिण पश्चिम रेखा करे ॥२०॥ दूसरी तीन रेखायें मध्य भाग में करे ॥२१॥ उसमें व्रीहि, यव को डाले ॥२२॥ “वर्षेण भूमिः पृथिवी वृतावृता०” से जल से संप्रोक्षण करके ॥२३॥ “यस्यामन्नं व्रीहि- यवौ०” से भूमि को नमस्कार करके ॥२४॥ अब अग्नि को प्रणयन करे “त्वामग्ने भृगवो०” इत्यादि से ॥२५॥ या “भद्रश्रेयःस्वस्त्या०” से ॥२६॥ या “अग्ने प्रेह०” से आहुति करे ॥२७॥ “विश्वंभरावसुधानी०” इत्यादि से रेखाओं को प्रतिष्ठा करके ॥२८॥ अब इध्मों का आधान करे ॥ २९ ॥ “अग्निर्भूम्यामोषधी०” इत्यादि पाँच ऋचा से स्तरण करे
२५४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । समाहितं जुषाणोऽस्मै क्षत्राणि धारयन्तमग्न इति पञ्च- भिः स्तरणम् ॥३०॥ अत ऊर्ध्वं बर्हिषः ॥३१॥ त्वं भूमि- मह्येष्योजसेति दर्भान् सम्प्रोक्ष्य ॥३२॥ ऋषोणां प्रस्तरोऽ- सीति दक्षिणतोऽग्नेर्ब्रह्मासनं निदधाति ॥३३॥ पुरस्ता- दग्नेरुदक्संस्तृणाति ॥३४॥ तथा प्रत्यक् ॥३५॥ प्रदक्षिणं बर्हिषां मूलानि च्छादयन्तोत्तरस्या वे दिश्रोणेः पूर्वोत्तरतः संस्थाप्य ॥३६॥ अहे दैधिषव्योदतस्तिष्ठान्यस्य सदने सीद योऽस्मत्पाकतर इति ब्रह्मासनमन्वीक्षते ॥३७॥ निरस्तः पराग्वसुः सह पाप्मना निरस्तः सोऽस्तु योऽ- स्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्म इति दक्षिणा तृणं निर- स्यति ॥३८॥ तदन्वालभ्य जपतीदमहमर्वाग्वसोः सदने
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २५५ इति द्यावापृथिव्यौ समीक्षते ॥४१॥ सविता प्रसवाना- मिति कर्मणिकर्मण्यभितोऽभ्यातानैराज्यं जुहुयात्॥४२॥ व्याख्यातं सर्वपाकयज्ञियं तन्त्रम् ॥४३॥१॥१३७॥ अष्टकायामष्टकाहोमाञ्जुहुयात् ॥१॥ तस्या हवींषि धानाः करम्भः शाष्कुल्यः पुरोडाश उदौदनः क्षीरौदनस्ति- लौदनो यथोपपादिपशुः ॥२॥ सर्वेषां हविषां समुद्धृत्य ॥३॥ दर्व्या जुहुयात्प्रथमा ह व्युवास सेति पञ्चभिः ॥४॥ आयमागन्संवत्सर इति चतसृभिर्विज्ञायते ॥५॥ ऋतुभ्यस्त्वेति विग्राहमष्टौ ॥६॥ इन्द्रपुत्र इत्यष्टादशीम् ॥७॥ अहोरात्राभ्यामित्यूनविंशीम् ॥८॥ पशावुपपद्य- माने दक्षिणं बाहुं निर्लोमं सचर्म सखुरं प्रक्षाल्य ॥९॥ इडायास्पदमिति द्वाभ्यां विंशीम् ॥१०॥ अनुपपद्यमान आज्यं जुहुयात् ॥११॥ हविषां दर्वि पूरयित्वा पूर्णा दर्व ॥३९॥४०॥४१॥ “सविता प्रसवानां०” इत्यादि प्रत्येक कर्म में अभ्या- तान मंत्रों से आज्य की आहुतियाँ देवे ॥४२॥ सर्व पाकयज्ञिय तन्त्र का व्याख्यान हुआ ॥४३॥१॥१३७॥ यह एकसौ सैंतीसवी कण्डिका पूरी हुई ॥ अष्टकाओंमें अष्टकाहोमों की आहुतियाँ देवे ॥१॥ उसकी आहुति के लिये धाना, करम्भ, पूरियाँ, पुरोडाश, जल में पका भात, क्षीरौदन, तिलौ- दन यथोपपादि पशु ॥२॥ सब ही हवियों को निकालकर ॥३॥ दर्वी से आहुतियाँ देवे “प्रथमा ह व्युवास०” इन पाँच ऋ० से आहुतियाँ करे ॥४॥ “आयमागन्संवत्सर०” इन चार से आहुतियाँ देनी जान पड़ती है ॥५॥ “ऋतुभ्यस्त्वा०” से भी आठ आहुतियाँ ॥६॥ “इन्द्रपुत्र०” इत्यादि से अठारहवी ॥ ७ ॥ “अहोरात्राभ्यां०” से उन्नीसवी ॥ ८ ॥ यदि पशु मिल जावे तो दहिने बाहु को लोम रहित, चर्म सहित, खुर सहित को प्रक्षालन करके ॥ ९ ॥ “इडायास्पदं०” इन दो ऋ० से बीसवी आहुति ॥१०॥ यदि पशु न मिले तो आज्य की आहुति करे ॥११॥ हवियों में दर्वी को डाल कर भर लेवे “पूर्णा दर्व०” से दर्वी सहित आहुति देवे ।