कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । जुहुयात् ॥ १ ॥ भुवाय स्वाहा भुवनाय स्वाहा भुवन- पतये स्वाहा भुवां पतये स्वाहा वोषाय स्वाहा विनताय स्वाहा शतारुणाय स्वाहा ॥२॥ यः प्राच्यां दिशि श्वेत- पिपीलिकानां राजा तस्मै स्वाहा। यो दक्षिणायां दिशि कृष्णपिपीलिकानां राजा तस्मै स्वाहा। यः प्रतीच्यां दिशि रजतपिपीलिकानां राजा तस्मै स्वाहा। य उदी- च्यां दिशि रोहितपिपीलिकानां राजा तस्मै स्वाहा। यो ध्रुवायां दिशि बभ्रुपिपीलिकानां राजा तस्मै स्वाहा। यो व्यध्वायां दिशि हरितपिपीलिकानां राजा तस्मै स्वाहा। य ऊर्ध्वायां दिश्यरुणपिपीलिकानां राजा तस्मै स्वाहा॥३॥ ताश्चेदेतावता न शाम्येयुस्तत उत्तरमग्निमुपसमा- धाय ॥ ४ ॥ शरमयं बर्हिरुभयतः परिच्छिन्नं प्रसव्यं परि- स्तीर्य ॥ ५ ॥ विषावध्वस्तमिङ्गिडमाज्यं शाकपलाशे- नोत्पूतं बाधकेन स्रुवेण जुहोति ॥६॥ उत्तिष्ठत निर्द्रवत न व इहास्त्वत्यश्वनम् । इन्द्रो वः सर्वासां साकं गर्भा- नाण्डानि भेत्स्यति । फडुताः पिपीलिका इति ॥ ७ ॥ इन्द्रो वो यमो वो वरुणो वोऽग्निर्वो वायुर्वः सूर्यो वश्चन्द्रो वः प्रजापतिर्व ईशानो व इति ॥८॥२४॥११६॥ अथ यत्रैतन्नीलमक्षा अनाचाररूपा दृश्यन्ते तत्र करे॥१॥ "भुवाय स्वाहा, भुवनाय स्वाहा०" इत्यादि से आहुति देवे ॥२॥ ॥३॥ यदि इससे न शान्ति करें तो उत्तर अग्नि का आधान करके ॥४॥ शरमयबर्हि जो दोनों ओर टूटे हों प्रसन्य परिस्तरण करके ॥५॥ विषा- वध्वस्त इङ्गिड आज्य को शाक के पत्ते से उत्पवन करके बाधक वृक्ष के स्रुव से आहुति देवे ॥६॥ "उत्तिष्ठत निर्द्रवत०" इत्यादि से ॥७॥ फिर "इन्द्रो वो यमो०" इत्यादि से आहुति देवे ॥८॥२४॥११६॥ यह एकसौ सोलहवी कण्डिका खतम हुई ॥