कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २३९
जुहुयात् ॥१॥ या मर्त्यैः सरथं यान्ति घोरा मृत्योर्दूत्यः क्रविशः सं बभूवुः। शिवं चक्षुरुत घोषः शिवानां शं नो अस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे ॥ शान्तं चक्षुरुत वायसीनां या ह्यासां घोरा मनसो विसृष्टिः ॥ मनसस्पते तन्वा मा पाहि घोरान्मा वि रिक्षि तन्वा मा प्रजया मा पशु- भिर्घायवे स्वाहेति हुत्वा ॥२॥ वात आ वातु भेषजमित्ये- तेन सूक्तेन जुहुयात् ॥३॥ वात आ वातु भेषजं शंभु मयोभु नो हृदे ॥ प्र ण आयूंषि ता°र्षत् ॥ उत वात पितासि न उत भ्रातोत नः सखा । स नो जीवातवे कृधि ॥ यददो वात ते गृहे निहितं भेषजं गुहा । तस्य नो धेहि जीवस इत्येतेन सूक्तेन जुहुयात् ॥४॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥५॥२५॥११७॥ अथ यत्रैतन्मधुमक्षिका अनाचाररूपा दृश्यन्ते मधु वात ऋतायत इत्येतेन सूक्तेन जुहुयात् ॥१॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥२॥२६॥११८॥ अथ यत्रैतदनाज्ञातमद्भुतं दृश्यते तत्र जुहुयात् ॥१॥ यदज्ञातमनाज्ञातमर्थस्य कर्मणो मिथः॥ अग्ने त्वं नस्त- स्मात्पाहि स हि वेत्थ यथायथम् ॥ अग्नये स्वाहा ॥२॥ वायो सूर्य चन्द्रेति च ॥३॥ पुरुषसंमितोऽर्थः कर्मार्थः
अब जहाँ नीले रंग की मक्षिका अनाचार रूप से दीख पड़ें, वहाँ आहुति देवे ॥१॥ “या मर्त्यैः सरथं यान्ति०” इत्यादि से आहुति देवे ॥२॥ “वात आ वातु०” इत्यादि सूक्त से आहुति देवे ॥३॥ 'वात आ वातु भेषजं०” इत्यादि सूक्त से आहुति देवे ॥४॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥५॥२५॥११७॥ यह एकसौ सतरहवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहाँ मधुमक्षिका अनाचार रूपा दीख पड़े, वहाँ आहुति देना चाहिये ॥१॥ “यदज्ञातमनाम्नातं०” इत्यादि से आहुति देवे ॥२॥