कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपुरुषसंमितः । वायुर्मा तस्मात्पातु स हि वेत्थ यथा- यथम् ॥ वायवे स्वाहा ॥४॥ अग्निर्मा सूर्यो मा चन्द्रो मेति च ॥५॥२७॥११९॥ अथ यत्रैतद्ग्रामे वावसाने वाग्निशरणे वा सम- ज्यायां वावदीर्येत चतस्रो धेनव उपक्लृप्ता भवन्ति श्वेता कृष्णा रोहिणी सुरूपा चतुर्थी ॥१॥ तासामेत- द्वादशरात्रं संदुग्धं नवनीतं निदधाति ॥२॥ द्वादश्याः प्रातर्यत्रैवादीऽवदीर्णं भवति तत उत्तरमग्निमुपसमा- धाय ॥३॥ परिसमुह्य पर्युक्ष्य परिस्तीर्य बर्हिः श्वेताया आज्येन सन्त्रीय ॥४॥ अग्निर्भूम्यामिति तिसृभिरभि मन्त्र्यालभ्य ॥५॥ अथ जुहुयात् ॥६॥ तथा दक्षिणार्धे ॥७॥ तथा पश्चार्धे ॥८॥ उत्तरार्धे संस्थाप्य वास्तोष्पत्यै- र्जुहुयात् ॥९॥ अवदीर्णे संपातानानीय संस्थाप्य होमान् ॥१०॥ अवदीर्णं शान्त्युदकेन संप्रोक्ष्य ॥११॥ ता एव “वायो सूर्य चन्द्रेति च०” इत्यादि से आहुति देवे ॥३॥४॥ “अग्निर्मा सूर्यो मा चन्द्रो मा०” इत्यादि से आहुति देवे ॥५॥२७॥११९॥ यह एकसौ उन्नीसवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहाँ ग्राम में या दहन गृह में या अग्निशाला में, या समज्या में कोई काष्ठ आदि फट या टूट जावे तो उसकी शान्ति के लिये ४ धेनु की आवश्यकता होती है । एक श्वेता, दूसरी काली, तीसरी रोहिणी, चौथी सुरूपा ॥ इन चारों के दूध, नवनीत १२ रात्र तक ग्रहण करे और द्वादशी के प्रातःकाल जहाँ, दीवार या काष्ठादि फट गया हो उससे उत्तर अग्नि का आधान करे ॥१॥२॥ परिसमूहन, पर्युक्षण, परिस्तरण करके बर्हिकुश को श्वेत गौ के घी से चपोट कर ॥४॥ “अग्निर्भूम्यां०” इत्यादि तीन ऋचा से अभिमंत्रण कर भूमि को स्पर्श करे ॥२॥ तब आहुति देवे ॥६॥ उसी प्रकार अग्नि के दक्षिणार्ध भाग में तथा पश्चिमार्ध में और उत्त- रार्द्ध में संस्थापन करके “वास्तोष्पत्य” ऋचाओं से आहुतियाँ देवे ॥७॥ ॥८॥९॥अवदीर्ण स्थान सम्पातों को लाकर होम को संस्थापन करके ॥१०॥