कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मणो दद्यात् ॥१२॥ सीरं वैश्योऽश्वं प्रादेशिको ग्राम- वरं राजा ॥१३॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥१४॥२८॥१२०॥ अथ यत्रैतदनुदक उदकोन्मीलो भवति हिरण्यवर्णा इत्यपां सूक्तैर्जुहुयात् ॥ १ ॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥ २ ॥ ॥२९॥१२१॥ अथ यत्रैतत्तिलाः समतैला भवन्ति तत्र जुहुयात् ॥१॥ अनूनाय स्वाहा। अक्षिताय स्वाहा । अपरिमिताय स्वाहा । परिपूर्णाय स्वाहा ॥ २ ॥ स यं द्विष्यात्तस्या- शायां लोहितं ते प्रसिञ्चामीति दक्षिणामुखः प्रसिञ्चेत् ॥३॥३०॥१२२॥ अथ यत्रैतद्वपां वा हवींषि वा वयांसि द्विपद चतुष्पदं वाभिमृश्यावगच्छेयुर्ये अग्नयो नमो देववधेभ्य इत्येताभ्यां सूक्ताभ्यां जुहुयात् ॥१॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः॥२॥३१॥१२३॥ अवदीर्ण को शान्ति जल से संप्रोक्षण करके ॥११॥ उसीको ब्राह्मण को दे देवे ॥१२॥ दक्षिणा में कर्त्ता को वैश्य (यजमान) सीर देवे, प्रादेशिक घोड़ा देवे और राजा ग्राम देवे ॥१३॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥१४॥ ॥२८॥१२०॥ यह एकसौ बीसवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहाँ विना जल के स्थान जल हो तो “हिरण्यवर्णा०” इत्यादि जल सूक्तों से आहुतियाँ देवे ॥१॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥२॥२९॥ ॥१२१॥ यह एकसौ इक्कीसवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहाँ तिल के बराबर उससे तैल निकले वहाँ आहुति देवे ॥१॥ अनूनाय स्वाहा। अक्षिताय स्वाहा। अपरिमिताय स्वाहा। परिपूर्णाय स्वाहा। “स यं द्विष्यात्तस्याशायां लोहितं ते प्रसिञ्चामि” से दक्षिणमुख सिंचन करे ॥२॥३॥३०॥१२२॥ यह एकसौ बाइसवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहाँ वपा को हवियों को चिल्ह, कौवे आदि लेकर भाग जावें तो “अग्नयो नमो देववधेभ्यः” इन दो सूक्तों से आहुतियाँ देवे ॥१॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥२॥३१॥१२३॥ यह एकसौ तेइसवी कण्डिका खतम हुई ॥ ३१