कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २३७ अथ यत्रैतद्धेनुर्धेनं धयति तत्र जुहुयात् ॥१॥ योगक्षेमं धेनुं वाजपत्नीमिन्द्राग्निभ्यां प्रेषिते जक्षभाने। तस्मान्मा- मग्ने परि पाहि घोरात्प्र नो जायन्तां मिथुनानि रूपशः॥ इन्द्राग्निभ्यां स्वाहेति हुत्वा ॥२॥ दिव्यो गन्धर्व इति मातृ- नामभिर्जुहुयात् ॥३॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥४।२२।११४॥ अथ यत्रैतद्गौर्वाश्वो वाश्वतरो वा पुरुषो वाका- शफेनमवगन्धयति तत्र जुहुयात् ॥१॥ पयो देवेषु पय ओषधीषु पय आशासु पयोऽन्तरिक्षे । तन्मे धाता च सविता च धत्तां विश्वे तद्देवा अभिसंगृणन्तु ॥ पयो यदप्सु पय उस्रियासु पय उत्सेषूत पर्वतेषु । तन्मे धाता च सविता च धत्तां विश्वे तद्देवा अभिसंगृणन्तु ॥ यन्मृगेषु पय आविष्ठमस्ति यदेजति पतति यत्पतत्रिषु । तन्मे धाता च सविता च धत्तां विश्वे तद्देवा अभि- संगृणन्तु ॥ यानि पयांसि दिव्यार्पितानि यान्यन्तरिक्षे बहुधा बहूनि । तेषामीशानं वशिनी नो अद्य प्रदत्ता द्यावापृथिवी अहृणीयमाना इत्येतेन सूक्तेन जुहुयात् ॥२॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥३।२३।११५॥ अथ यत्रैतत्पिपीलिका अनाचाररूपा दृश्यन्ते तत्र अब जहाँ धेनु धेनु से मैथुन करना चाहती है, वहाँ आहुति करे ॥१॥ “योगक्षेमं धेनुं०” इत्यादि से आहुति देकर ॥२॥ “दिव्यो गन्धर्व०” और मातृ नामों से आहुतियाँ देवे ॥२।३॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥४।२२।११४॥ यह एकसौ चौदहवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहाँ गौ या अश्व या अश्वतर या पुरुष आकाश के फेन का गन्ध लेता है, वहाँ आहुति करे ॥१॥ “पयो देवेषु०” इत्यादि इस सूक्त से आहुति करे ॥२॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥३।२३।११५॥ यह एकसौ पन्द्रहवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहाँ पिपीलिका अनाचार रूप से दीखने लगतीं, तहाँ आहुति