कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । मरुतो हेतिमिच्छत ॥४॥ रुक्मं कर्त्रे दद्यात् ॥५॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥६॥३६॥१२८॥ अथ यत्रैतन्मांसमुखो निपतति तत्र जुहुयात् ॥१॥ घोरो वज्रो देवसृष्टो न आगन्यद्वा गृहान्घोरमुता जगाम। तन्निर्जगाम हविषा घृतेन शं नो अस्तु द्विपदे शं चतु- ष्पदे ॥ रुद्राय स्वाहेति हुत्वा ॥२॥ भवाशर्वौ मृडतं मा- भियातमित्येतेन सूक्तेन जुहुयात् ॥३॥ सा तत्र प्राय- श्चित्तिः ॥४॥३७॥१२९॥ अथ यत्रैतदनग्नाववभासो भवति तत्र जुहुयात् ॥१॥ या तेऽवदीसिरवरूपा जातवेदोऽपेतो रक्षांसं भाग एषः। रक्षांसि तया दह जावेदो या नः प्रजां मनुष्यां सं सृजन्ते ॥ अग्नये स्वाहेति हुत्वा ॥२॥ अग्नी रक्षांसि सेधतीति प्रायश्चित्तिः ॥३॥३८॥१३०॥ अथ यत्रैतदग्निः श्वसतीव तत्र जुहुयात् ॥१॥ श्वेता कृष्णा रोहिणी जातवेदो यास्ते तनूस्तिरश्चीना निर्दहन्तीः श्वसन्तीः। रक्षांसि ताभिर्दह जातवेदो या सोना देवे ॥५॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥६॥३६॥१२८॥ यह एकसौ अट्ठाइसवी कण्डिका खतम हुई । अब जहां मांस सम्मुख गिरता हो, तहां आहुति करे ॥१॥ “घोरो वज्रो०” इत्यादि से आहुति करे ॥२॥ “भवा शर्वौ०” इत्यादि सूक्त से आहुति करे ॥३॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥४॥३७॥१२९॥ यह एकसौ उन्तीसवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहां विना आग के स्थान में आग का आभास हो, तहां आ- हुति करे ॥१॥ “या तेऽवदीप्ति०” इत्यादि से आहुति देवे ॥२॥ “अग्नी रक्षांसि सेधति०” इत्यादि से आहुति करे यही उसकी प्रायश्चित्ति है ॥३॥३८॥१३०॥ यह एकसौ तीसवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहां अग्नि सांस लेती प्रतीत होवे, तहां आहुति करे ॥१॥ “श्वेता