भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

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अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २४५ स्य ॥६॥ प्रति त्यं चारुमध्वरं गोपीथाय प्रहूयसे । मरु- द्भिरग्न आ गहीति मारुतस्य ॥७॥ अपामग्निरित्याग्नेयस्य ॥८॥ प्रजापतिः सलिलादिति प्राजापत्यस्य । अपां सूक्तै- र्हिरण्यशकलेन सहोद्रमप्सु प्रवेशयेत् ॥१०॥ प्र हैव वर्षति ॥११॥ सर्वस्वं तत्र दक्षिणा ॥१२॥ तस्य निष्क्रयो यथार्हं यथासम्पद्वा ॥१३॥३५॥१२७॥ अथ यत्रैतन्नक्षत्राणि पतापतानीव भवन्ति तत्र जुहुयात् ॥१॥ यन्नक्षत्रं पतति जातवेदः सोमेन राज्ञेभिरं पुरस्तात् । तस्मान्मामग्ने परिपाहि घोरात्प्र णो जायन्तां मिथुनानि रूपशः ॥ इन्द्राग्निभ्यां स्वाहेति हुत्वा ॥२॥ सोमो राजा सविता च राजेत्येतेन सूक्तेन जुहुयात् ॥३॥ सोमो राजा सविता च राजा भुवो राजा भुवनं च राजा । शर्वो राजा शर्म च राजा त उ नः शर्म यच्छन्तु देवाः ॥ आदित्यैर्नो बृहस्पतिर्भगः सोमेन नः सह । विश्वे- देवा उर्वन्तरिक्षं त उ नः शर्म यच्छन्तु देवाः । उता- विद्वाग्निकृद्याथोस्त्रघ्नी यथायथम् । मा नो विश्वेदेवा इत्यादि से वायव्य की आहुति करे ॥५॥ "आशानां०" से दिश्य देवता की आहुति करे ॥६॥ "प्रति त्यं०" इत्यादि से मारुत की आहुति देवे ॥७॥ "अपामग्निः" इत्यादि से आग्नेय आहुति देवे ॥८॥ "सलिलात्" से प्राजापात्य आहुति देवे ॥९॥ जल सूक्तों से सोने के टुकड़े से उद्र के सहित को जल में प्रवेश करावे ॥१०॥ अवश्य ही वृष्टि होगी ॥११॥ इसकी दक्षिणा सर्वस्व देवे ॥१२॥ या उसका निष्क्रय यथाशक्ति या यथासम्पत् देवे ॥१३॥३५॥१२७॥ यह एकसौ सत्ताइसवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहां नक्षत्र गण गिरते या टूट कर गिरते से जान पड़ें, वहां आहुति करे ॥१॥ "यन्नक्षत्रं पतति०" इत्यादि से आहुति करके ॥२॥ "सोमो राजा०" इत्यादि सूक्त से आहुति देवे ॥३॥४॥ कर्त्ता को दक्षिणा