भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

पृष्ठ 285, कुल 361 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 285

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २५३ यति ॥१६॥ यस्याश्चतस्रः प्रदिशः पृथिव्या इति चतुरस्रां करोति ॥१७॥ देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यामादद इति लेखनमादाय यत्राग्निं निधा- स्यन्भवति तत्र लक्षणं करोति ॥१८॥ इन्द्रः सीतां निगृह्णात्विति दक्षिणत आरभ्योत्तरत आलिखति॥१९॥ प्राचीमावृत्य दक्षिणतः प्राचीम् ॥२०॥ अपरास्तिस्रो मध्ये ॥२१॥ तस्यां व्रीहियवावोष्य ॥२२॥ वर्षेण भूमिः पृथिवी वृतावृतेत्यद्भिः सम्प्रोक्ष्य ॥२३॥ यस्यामन्नं व्रीहि- यवाविति भूमिं नमस्कृत्य ॥२४॥ अथाग्निं प्रणयेत् । त्वामग्ने भृगवो नयन्तामङ्गिरसः सदनं श्रेय एहि । विश्वकर्मा पुर एतु प्रजानन्धिष्ण्यं पन्थामनु ते दिशा- मेति ॥२५॥ भद्रश्रेयःस्वस्त्या वा ॥२६॥ अग्ने प्रेहीति वा॥२७॥ विश्वम्भरा वसुधानी प्रतिष्ठेति लक्षणे प्रतिष्ठाप्य ॥२८॥ अथेध्ममुपसमादधाति ॥२९॥ अग्निर्भूम्यामोषधी- ष्वग्निर्दिव आ तपत्यग्निवासाः पृथिव्यसितजूरेतमिध्मं बिछावे ॥१६॥ “यस्याश्चतस्रः प्रदिशः पृथिव्या” इत्यादि से चौकोन वेदि बनावे ॥१७॥ “देवस्य त्वा०” इत्यादि से लेखन को लेकर, जहाँ अग्नि का आधान करना होगा, वहाँ रेखायें खैंचे ॥१८॥ “इन्द्रः सीतां निगृह्णातु०” से दक्षिण से आरम्भ कर उत्तर तक रेखा करे ॥१९॥ पूर्व से लेकर दक्षिण पश्चिम रेखा करे ॥२०॥ दूसरी तीन रेखायें मध्य भाग में करे ॥२१॥ उसमें व्रीहि, यव को डाले ॥२२॥ “वर्षेण भूमिः पृथिवी वृतावृता०” से जल से संप्रोक्षण करके ॥२३॥ “यस्यामन्नं व्रीहि- यवौ०” से भूमि को नमस्कार करके ॥२४॥ अब अग्नि को प्रणयन करे “त्वामग्ने भृगवो०” इत्यादि से ॥२५॥ या “भद्रश्रेयःस्वस्त्या०” से ॥२६॥ या “अग्ने प्रेह०” से आहुति करे ॥२७॥ “विश्वंभरावसुधानी०” इत्यादि से रेखाओं को प्रतिष्ठा करके ॥२८॥ अब इध्मों का आधान करे ॥ २९ ॥ “अग्निर्भूम्यामोषधी०” इत्यादि पाँच ऋचा से स्तरण करे