भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

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२५२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । यथावितानं यज्ञवास्त्वध्यवसेत् ॥१॥ वेदिर्यज्ञस्या- ग्नेरुत्तरवेदिः॥२॥ उभे प्रागायते किञ्चित्प्रथीयस्यौ पश्चादु- द्यततरे ॥३॥ अपृथुसंमितां वेदिं विदध्यात् ॥४॥ षट्शमीं प्रागायतां चतुःशमीं श्रोण्याम् ॥५॥ त्रीन् मध्ये अधच- तुर्थानग्रतः ॥६॥ त्रयाणां पुरस्तादुत्तरवेदिं विदध्यात् ॥७॥ द्विशमीं प्रागायतामृज्वीमध्यर्धशमीं श्रोण्याम् ॥८॥ ग्रीष्मस्ते भूम इत्युपस्थाय ॥९॥ विमिमीष्व पयस्वतीमिति मिमानमनुमन्त्रयते ॥१०॥ बृहस्पते परिगृहाण वेदिं सुगा वो देवाः सदनानि सन्तु । अस्यां बर्हिः प्रथतां साध्वन्तर- हिंस्रा णः पृथिवी देव्यस्त्विति परिगृह्णाति ॥११॥ यत्ते भूम इति विखनति ॥१२॥ यत्त ऊनमिति संवपति ॥१३॥ त्वमस्यावपनी जनानामिति ततः पांसूनान्यतोदाहार्य ॥१४॥ बृहस्पते परिगृहाण वेदिमित्युत्तरवेदिमोप्यमानां परि- गृह्णाति ॥१५॥ असम्बाधं बध्यतो मानवानामिति प्रथ- यज्ञ के अनुसार (बड़े, छोटे आदि) यज्ञ गृह बनावे ॥१॥ अग्नि के उत्तर यज्ञवेदि बनावे। दोनों पूर्व-पश्चिम चौड़ा एवं कुछ मोटे हों उत्तर- दक्षिण लम्बी हो ॥ २ ॥ ३ ॥ अपृथु सम्मित वेदि बनावे ॥४॥ छः शमी पूर्वायत हों और चार शमी को श्रोणी में धरे ॥५॥ तीन को मध्य में, साढ़े चार शमी को आगे में ॥ ६ ॥ तीनों के पूर्व उत्तर वेदिको बनावे ॥ ७ ॥ दो शमी को पूर्वायता ऋज्वी हों और चौथाई शमी श्रोणी पर धरे ॥८॥ “ग्रीष्मस्ते भूम०” से उपस्थान करके ॥९॥ “विमिमीष्व पयस्वतीं०” से नापनेवाले को अनुमंत्रण करे ॥१०॥ “बृहस्पते परिगृहाण०” इत्यादि से परिग्रहण करे ॥११॥ “यत्ते भूम०” से भूमि को खनन करे ॥१२॥ “यत्त ऊनं०” से भर देवे ॥१३॥ “त्वमस्यावपनी०” इत्यादि से दूसरी जगह से धूलि को लाकरके ॥१४॥ “बृहस्पते परिगृहाण वेदिं०” इत्यादि से वेदि को भरते हुए को परिग्रहण करे ॥१५॥ “असंबाधं बध्यतो मान- बानां०” से वेदि को पूर्व को ढालुआ बनावे और बालु को उस पर